मीरा कुमार की बेइज्जती कर खरगे ने लालू के एजेंडे को पहनाया अमलीजामा
-रितेश सिन्हा
कांग्रेस में अधिवेशन से पहले अहमदाबाद में राहुल के स्लीपर सेल हटाने के बयान को ग्रुप 23 ने पूरी तरह फेल कर दिया है। बिहार में लोकसभा चुनाव के बाद से ही राजद के तेजस्वी के बयान और कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के द्वारा अलग-अलग चुनाव लड़ने की बयानबाजी हो रही थी।
ग्रुप 23 और स्लीपर सेल के नेता और खरगे के खासमखास नेता मोहन प्रकाश की छुट्टी कर कृष्णा अल्लावरू की नियुक्ति की थी। उन्होंने बिहार में उतरते ही अकेले चुनाव लड़ने के संकेत दिए थे और सार्वजनिक बयानबाजी भी की थी। लालू ने अपने खेमे के कांग्रेसियों को गठबंधन की तार जोड़े रखने में जुटा दिया और व्यक्तिगत अदावत में अखिलेश सिंह की छुट्टी हो गई।
कन्हैया कुमार भी बिहार में अपनी जगह बनाने और चुनाव लड़ने के लिए अपने क्षेत्र की तलाश में निकले हैं। कन्हैया की प्राथमिकता बतौर एनएसयूआई प्रभारी पटना यूनिवर्सिटी का चुनाव लड़वाना था। लेकिन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की वजह से छात्रसंघ के लिए कोई बयान तक नही दिया। अलबत्ता बिहार के युवाओं के बीच हीरो बने खान सर ने नीतीश सरकार के खिलाफ जो माहौल बनाया था, उससे एनएसयूआई को दो महिला उम्मीदवारों को बंपर जीत मिली।
दूसरा कारण प्रशांत किशोर और राहुल के बीच हुए राजनीतिक संवाद ने खेल पलट दिया। हाशिए पर रही एनएसयूआई को जनसुराज के छात्र संगठन का सीधा लाभ मिला।
पहले पटना में खरगे की लालू के साथ जाने वाले कांग्रेसी नेताओं का मन टटोला। ओके रिपोर्ट के बाद अगले दिन दिल्ली की बैठक में लालू के राजद के साथ लड़ने का फैसला कर लिया। कांग्रेस के लिए ताल ठोक रहे सांसद पप्पू यादव को करारा झटका दे दिया। वहीं कन्हैया 500 टके वाले अपने पेड वर्करों के साथ यात्रा जारी रखे हुए है। गठबंधन की खबरों के बीच वो कहां से चुनाव लड़ेंगे और कैसे जीतेंगे, यह भगवान भरोसे ही है। स्लीपर सेल के नाम से राहुल की मुहिम टाय-टाय फिस है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री, कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मीरा कुमार जिन्हें कांग्रेस ने महिला लोकसभा अध्यक्षा बनने का गौरव दिया और राष्ट्रपति का चुनाव लड़वाया, वो दलित नेत्री को दिल्ली के इंदिरा भवन में आयोजित बिहार की एक मीटिंग में अपमानित किया जा चुका है। छुटभैया नेता राहुल और खरगे के साथ मंच साझा कर रहे थे और मीरा कुमार नीचे बैठी अपनी बारी का इंतजार कर रही थी।
खरगे इससे पहले पूर्व गृह मंत्री व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार शिंदे को भी अपमानित कर चुके हैं, जो फिलहाल हाशिए पर हैं। मल्लिकार्जुन खरगे राहुल गांधी से जुड़े वरिष्ठ नेताओं को मौका मिलते ही अपमानित करने का कोई मौका नहीं चूकते। पूर्व मंत्री व कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे पवन बंसल का वो शिकार कर चुके हैं। जिलेवार जिलाध्यक्षों की मीटिंग चालू है, उसके बाद एआईसीसी का सत्र बुलाकर खरगे इतिश्री कर केवल इतिहास बनाना चाहते हैं।
खरगे की दिलचस्पी गांधी-नेहरू परिवार को उलझाए रखना है जिसमें ग्रुप 23 के नेताओं को आगे कर वो अपना खेल बखूबी खेल रहे हैं। देखना है कि कांग्रेस के महाधिवेशन में पार्टी अध्यक्ष कौन से एजेंडे को लागू करवाते हैं। अब तक खरगे ने कांग्रेस में हार की जिम्मेदार नेताओं को अपने टीम में बनाए रखा है। उन नेताओं के खिलाफ शिकायतों का अंबार है, मगर इनाम के तौर पर एआईसीसी में प्रमुख पदों पर काबिज हैं।
खरगे और उनकी टीम नहीं चाहती है कि कांग्रेस के कार्यकर्ता और छोटे नेता उनसे संपर्क साध सकें और वरिष्ठ नेताओं से मिलकर जमीनी हकीकत बता सकें। नई दिल्ली के इंदिरा भवन स्थित एआईसीसी मुख्यालय में घुस पाना टेढ़ी खीर है। खरगे ने इंदिरा भवन तक पूरे कांग्रेस को समेटने का इंतजाम कर दिया है।
एआईसीसी का पिछला सत्र रायपुर में 24-26 फरवरी 2023 में हुआ था। तीन सालों की बकाया रकम वसूली के लिए अहमदाबाद में 8-9 अप्रैल 2025 को महाधिवेशन का आयोजन किया जा रहा है। लगभग 2000 स्थायी और विशेष आमंत्रित सदस्यों से चंदा वसूली का मामला है।
खरगे की योजना देखिए कि लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी का 7 अप्रैल को बिहार में कांग्रेसियों के साथ अहम बैठक है और 8-9 अप्रैल को सेशन रखा है। खरगे जानते हैं कि बिहारी आवाज बुलंद करने के मामले में सबसे आगे रहे हैं। बिहार कांग्रेसजनों की भावनाओं के खिलाफ खरगे ने चंद स्वार्थी नेताओं को दिल्ली बुलाकर गठबंधन पर मोहर लगवा ली, मगर अधिवेशन में उनसे बच पाना बड़ा मुश्किल है।
इसी का तरीका खोजते हुए राहुल का बिहार दौरा 7 अप्रैल को तय किया गया। बिहार में राहुल रहेंगे, बिहारी कांग्रेसी पटना में फंसे रहेंगे और खरगे अहमदाबाद के सेशन से साफ बच निकलेंगे। रमेश चेन्नीथला अपनी धोती बिहार के नेताओं से उतरवा चुके हैं।
प्रभारी रहे मुकुल वासनिक, शक्ति सिंह गोहिल समेत कई बड़े नेता लात-मुक्कों के साथ गुस्से के शिकार कर चुके हैं। लालू के साथ गठबंधन पर मोहर लगवा कर कांग्रेसियों के साथ बड़ा पंगा खरगे ले चुके हैं। बिहार चुनाव में अभी काफी समय है, खरगे कब तक इन बिहारी खांटी कांग्रेसियों से बचे रहेंगे, यह देखना अब दिलचस्प होगा।