बांग्लादेश में पिछले 23 दिनों मे 7 हिंदुओं की सरेआम नृशंस हत्या कर दी गई। इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा उन्हें ना सिर्फ पीट पीट के मारा गया अपितु,चाकू से गोदना, पेट्रोल छिड़ककर आग लगाना, पौंड में धकेलना, घरों में घुसकर हमले करना, वहां के आक्रांताओं का जैसे अधिकार सा बन गया है! वहां की जेलों में भी अनेक हिंदू अपनी जान दे चुके। कल हिंदू सिंगर प्रलय चाकी पावना जिला जेल में ही इलाज के अभाव में अपनी जान गंवा चुके।
दीपू चंद्र दास, अमृत मंडल, बृजेंद्र विश्वास, खोकन चंद्र दास, राणा प्रताप बैरागी व शरत मनी चक्रवर्ती के बाद अब एक गरीब रिक्शा चालक समीर कुमार दास की भी निर्मम हत्या कर दी गई। वहां के अनगिनत हिंदू मंदिर, घर, दुकान, मकान व प्रतिष्ठानों को अतिवादियों ने अपनी हिंसा व अमानवीय अत्याचारों का शिकार बनाया। हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार व बच्चों के विरुद्ध अपराध आम हो गए हैं।
इन भयंकर परिस्थितियों में भी सम्पूर्ण विश्व के मानवाधिकार संगठनों में एक गहरा सन्नाटा है। कार्यवाही तो दूर, उनके होठों पर ताले लगे हैं क्योंकि पीड़ित हिंदू हैं और आक्रांता जिहादी शैतान। जिहादियों द्वारा सरेआम मानवता की हत्या होते हुए भी नोबेल शांति पुरस्कार विजेता अशांति के साम्राज्य के नायक बने हुए हैं। उन्हें कोई नहीं पूछ रहा कि तुम क्या कर रहे हो?
उन के शासन में चहुं ओर अशांति पसारी पड़ी है फिर भी वे पूरी तरह से शांत बैठे हैं। उन्हें अपनी नाकामी और जिहादियों के समक्ष समर्पण के लिए माफी मांगनी चाहिए।
अब प्रश्न उठते हैं कि…
क्या बांग्लादेश के मूल निवासी हिंदू किसी मानवाधिकार के अधिकारी नहीं?
क्या हिंदुओं के जान माल की सुरक्षा की जिम्मेदारी वहां की सरकार की नहीं?
कहीं यह हिंदुओं को समाप्त करने का राज्य प्रायोजित कोई गहरा षड्यंत्र ही तो नहीं?
क्या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार वादी संगठन @UN @UNHumanRights को अपनी अपनी दुकानें बंद कर दुनिया में मानवाधिकारों की रक्षा का दंभ भरने से परहेज नहीं करना चाहिए?
*विनोद बंसल राष्ट्रीय प्रवक्ता विहिप







