90 साल की लीज पर सरकारी जमीन देने की नीति पर भाकपा ने उठाए सवाल, स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी और स्वामित्व का मुद्दा उठाया

 

देहरादून-

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), उत्तराखंड ने राज्य सरकार की सरकारी भूमि को दीर्घकालीन लीज पर निजी निवेशकों को उपलब्ध कराने की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि विकास और निवेश के साथ यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि राज्य की भूमि और प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाले दीर्घकालीन आर्थिक लाभ में स्थानीय जनता की हिस्सेदारी किस प्रकार सुनिश्चित होगी। यह मुद्दा पार्टी द्वारा जारी दस्तावेज में प्रमुखता से उठाया गया है।

भाकपा का कहना है कि उसका सवाल उत्तराखंड में निवेश या पर्यटन विकास के विरोध का नहीं, बल्कि सरकारी भूमि, प्राकृतिक संसाधनों और उनसे उत्पन्न होने वाली आर्थिक गतिविधियों में राज्य तथा स्थानीय समुदाय की दीर्घकालीन भागीदारी का है। पार्टी ने पूछा है कि निवेश किसके हित में होगा, विकास का वास्तविक लाभ किसे मिलेगा और सरकारी भूमि से पैदा होने वाली संपदा में राज्य की निरंतर हिस्सेदारी कैसे सुनिश्चित की जाएगी।

पार्टी ने पटवाड़ीडांगर की सरकारी भूमि से संबंधित निविदा का उदाहरण देते हुए कहा है कि 13.64 एकड़ भूमि के लिए ₹37.80 करोड़ के आरक्षित प्रीमियम तथा ₹2.76 लाख वार्षिक किराये का प्रावधान और 90 वर्ष की लीज अवधि का उल्लेख किया गया है। भाकपा ने सवाल उठाया है कि क्या केवल प्रारंभिक प्रीमियम प्राप्त करना सार्वजनिक संपत्ति से होने वाले दीर्घकालीन आर्थिक लाभ में राज्य की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है।

भाकपा के अनुसार बड़े होटल और रिसॉर्ट बनने से निवेश तथा रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं, लेकिन पार्टी चाहती है कि स्थानीय युवाओं को केवल सेवा क्षेत्र में नौकरी तक सीमित रखने के बजाय उन्हें उद्यमिता, निवेश और स्वामित्व में भी भागीदारी का अवसर मिले। पार्टी ने स्थानीय युवाओं, नागरिकों और सहकारी संस्थाओं की परियोजनाओं में भागीदारी तथा सरकारी भूमि के मूल्य को राज्य की इक्विटी के रूप में शामिल करने जैसे विकल्पों पर विचार करने की मांग की है।

पार्टी ने पर्यटन विकास को केवल होटल और रिसॉर्ट निर्माण तक सीमित न रखने की बात कही है। उसके अनुसार होमस्टे, कृषि-बागवानी, स्थानीय उत्पाद, हस्तशिल्प, स्थानीय भोजन, परिवहन, साहसिक पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों को जोड़कर व्यापक पर्यटन अर्थव्यवस्था विकसित की जा सकती है, जिससे छोटे स्थानीय उद्यमों को भी अवसर मिलें।

भाकपा ने एक वैकल्पिक विकास मॉडल का सुझाव देते हुए कहा है कि सरकारी भूमि राज्य के पास बनी रहे, भूमि का मूल्य राज्य की इक्विटी के रूप में शामिल किया जाए, जबकि निजी पूंजी और तकनीक को परियोजनाओं में लाया जाए। साथ ही स्थानीय नागरिकों और सहकारी संस्थाओं की भागीदारी तथा परियोजना की आय में राज्य की निरंतर हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए। पार्टी ने पर्यटन से उत्पन्न पूंजी के एक हिस्से को उत्तराखंड में ही पुनर्निवेश करने की आवश्यकता भी बताई है।

पार्टी ने “पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी” से जुड़ी पारंपरिक कहावत को बदलने की आवश्यकता पर भी जोर दिया है। भाकपा का कहना है कि पहाड़ के जल संसाधन को स्थानीय अर्थव्यवस्था और उत्पादन का आधार तथा युवाओं को ज्ञान, कौशल, उद्यम, पूंजी और स्वामित्व की शक्ति बनाया जा सकता है।

भाकपा उत्तराखंड राज्य परिषद ने बताया है कि वह सरकारी भूमि के हस्तांतरण, दीर्घकालीन लीज, राज्य को मिलने वाले आर्थिक प्रतिफल, निविदा की शर्तों, पर्यावरणीय वहन-क्षमता, पर्यटन विकास मॉडल, स्थानीय रोजगार और पलायन जैसे विषयों पर एक श्वेत पत्र जारी करेगी। पार्टी के अनुसार इसका उद्देश्य सरकार की आलोचना तक सीमित न रहकर उत्तराखंड के विकास के लिए एक वैकल्पिक दिशा प्रस्तुत करना है।

पार्टी ने सरकार से मांग की है कि 90 वर्ष जैसी दीर्घकालीन लीज पर सरकारी भूमि उपलब्ध कराने से पहले सार्वजनिक बहस, स्वतंत्र आर्थिक मूल्यांकन, पर्यावरणीय अध्ययन और स्थानीय समाज की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। साथ ही राज्य और स्थानीय जनता की दीर्घकालीन आर्थिक हिस्सेदारी के वैकल्पिक मॉडल पर विचार किया जाए।

भाकपा ने कहा है कि उत्तराखंड की विकास नीति में पहाड़ों को केवल पर्यटन स्थल के रूप में नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए अवसर, पूंजी और स्वामित्व का केंद्र बनाने पर जोर होना चाहिए।

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