
• प्रदेश के औसत से भी अधिक है आगरा मंडल में एनीमिया प्रभावित महिलाएं
• सिर्फ आयरन की गोली खाना काफी नहीं, रसोई में सजी थाली को अपनाएं, एनीमिया होगा छूमंतर
आगरा,
थकान, सांस फूलना और चेहरे की रंगत फीकी पड़ना—ये केवल काम के बोझ के लक्षण नहीं, बल्कि उस ‘साइलेंट किलर’ के संकेत हैं जो आधी से अधिक आबादी को चुपचाप चपेट में ले चुका है। आमतौर पर एनीमिया का इलाज सिर्फ आयरन की गोलियों तक सीमित मान लिया जाता है, लेकिन जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों और आहार विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं से ज्यादा टिकाऊ और प्रभावी समाधान हमारी रसोई में छिपा है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश और विशेष रूप से आगरा मंडल में एनीमिया गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है।
मंडल में महिलाओं में एनीमिया का स्तर राज्य के औसत के आसपास या कई जिलों में उससे भी अधिक है। आगरा जिले की बात करें तो यहाँ 15-49 वर्ष की 59.4% महिलाएं और 61.8% गर्भवती महिलाएं एनीमिया से प्रभावित हैं। फिरोजाबाद में 15-49 वर्ष की 57.1% महिलाएं और 45.8% गर्भवती महिलाएं एनीमिया से प्रभावित हैं। मथुरा में 15-49 वर्ष की 63.0% महिलाएं और 55.2% गर्भवती महिलाएं एनीमिया और मैनपुरी में 15-49 वर्ष की 57.8% से महिलाएं और 48.4% गर्भवती महिलाएं एनीमिया से प्रभावित पाई गईं हैं।

केवल आयरन की कमी नहीं, पोषण है वजह:
जिला महिला चिकित्सालय (लेडी लॉयल) की स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ. आशु के अनुसार भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार, एनीमिया केवल आयरन की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि यह फोलिक एसिड, विटामिन बी 12 और विटामिन-ए जैसे अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों के अभाव से भी जुड़ा है।
उन्होंने बताया कि कि गर्भावस्था और धात्री अवधि के दौरान शरीर को आयरन और आवश्यक पोषक तत्वों की अत्यधिक आवश्यकता होती है। इस चरण में एनीमिया का प्रभाव माँ और बच्चे दोनों के लिए जोखिम भरा होता है। प्रसव पश्चात अत्यधिक रक्तस्राव (पीपीएच) और मातृ मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। वहीं, एनीमिया के कारण समय से पहले प्रसव (प्री-टर्म डिलीवरी), कम वजन वाले बच्चे (लो बर्थ वेट) का जन्म और गर्भ में शिशु के कमजोर विकास का जोखिम रहता है। यदि धात्री माता के एनेमिक होने से रिकवरी धीमी हो जाती है, जिसका अप्रत्यक्ष असर शिशु की देखभाल और उसके पोषण पर पड़ता है।

चुनौतियां और राह:
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अरुण कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि आगरा मंडल में ‘एनीमिया मुक्त भारत’ अभियान के अंतर्गत विभाग द्वारा गर्भवती महिलाओं को आयरन एवं फॉलिक एसिड की गोलियों का नियमित वितरण किया जा रहा है। गंभीर एनीमिया की स्थिति में जब हीमोग्लोबिन का स्तर बहुत कम हो जाता है और गोलियों/सिरप से सुधार नहीं होता हैतो नस (आईवी) के माध्यम से आयरन सुक्रोज या एफसीएम इंजेक्शन दिया जाता है। हालांकि, पोषण युक्त आहार के प्रति जागरूकता की कमी, कम उम्र में विवाह, बार-बार गर्भधारण और आयरन गोलियों का नियमित सेवन न करने के कारण एनीमिया की स्थिति में अपेक्षित सुधार अभी भी विभाग के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
नीतिगत बदलाव और सामुदायिक जागरूकता:
जिला कार्यक्रम अधिकारी मनोज कुमार मौर्य ने बताया कि स्वास्थ्य मंत्रालय और ‘एनीमिया मुक्त भारत’ अभियान के तहत भी अब दवाओं के साथ-साथ ‘पोषण आधारित हस्तक्षेप’ पर जोर दिया जा रहा है। स्कूलों में मिड-डे मील और आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से फोर्टिफाइड चावल, सहजन (मोरिंगा) की पत्तियां और स्थानीय पौष्टिक अनाज को बढ़ावा दिया जा रहा है।
मथुरा जिला अस्पताल के डायटिशियन डॉ. मयंक सारस्वत का कहना है कि जब तक शरीर को सही आहार के जरिए एकीकृत पोषण नहीं मिलेगा, तब तक केवल सप्लीमेंट्स के सहारे हीमोग्लोबिन का स्तर स्थायी रूप से नहीं सुधारा जा सकता। घर की थाली में ही एनीमिया प्रबंधन का राज छिपा है। यदि सही मात्रा में सही आहारयुक्त भोजन थाली में शामिल किया जाए तो एनीमिया से बचाव संभव है। एनीमिया से बचाव और प्रबंधन के लिए आहार में विविधता और संतुलन सबसे अहम है। आयरन से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे पालक, मेथी, सरसों जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां, चना, राजमा, मसूर की दाल और बाजरा-ज्वार जैसे मोटे अनाज। इसके अलावा गुड़, तिल और खजूर का नियमित सेवन हीमोग्लोबिन बढ़ाने में मददगार है। मांसाहारी विकल्प के तौर पर अंडा, मछली और मीट आयरन के सबसे सुलभ स्रोत हैं।
उन्होंने बताया कि सिर्फ आयरन खाना ही काफी नहीं, शरीर उसका अवशोषण कर सके, इसके लिए विटामिन-सी अनिवार्य है। भोजन में नीबू, आंवला, संतरा, टमाटर और अमरूद शामिल करने से पौधा-आधारित आयरन का अवशोषण तीन गुना तक बढ़ जाता है। विटामिन बी12 और फोलिक एसिड शरीर में नए लाल रक्त कोशिकाओं (आरबीसी) के निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके लिए दूध, दही, पनीर, अंकुरित अनाज और दालों का सेवन अति आवश्यक हैं।
खान-पान की वे गलतियां जो बनती हैं रुकावट:
आगरा जिला अस्पताल की डायटीशियन ललितेश शर्मा बताती हैं कि कई बार हम पौष्टिक भोजन तो लेते हैं, लेकिन गलत आदतों की वजह से शरीर को लाभ नहीं मिल पाता। भोजन के तुरंत बाद चाय या कॉफी न लें। चाय-कॉफी में मौजूद टैनिन और फाइटेट्स शरीर में आयरन के अवशोषण को रोकते हैं। खाने के कम से कम एक घंटे तक इनका सेवन न करें। इसी प्रकार कैल्शियम और आयरन एक साथ न लें। दूध या कैल्शियम युक्त पदार्थों को आयरन-समृद्ध भोजन के साथ सीधे लेने से बचें, क्योंकि दोनों एक-दूसरे के अवशोषण में बाधा डालते हैं।
उन्होंने बताया कि “दवाएं आपातकालीन स्थिति में राहत दे सकती हैं, लेकिन एनीमिया के स्थायी उन्मूलन का रास्ता केवल रसोई घर और पौष्टिक थाली से होकर गुजरता है।”
नीम वाली दरगाह, बोदला निवासी 23 वर्षीय आयशा बताती हैं कि यह उनका पहला बच्चा है। गर्भावस्था के पांचवें महीने में उन्हें कमजोरी और सांस फूलने की समस्या होने लगी थी। छोटा-मोटा काम करने पर भी सांस फूल जाती थी। इस दौरान आशा कार्यकर्ता मेहज़बीन ने शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर उनकी जांच कराई। जांच रिपोर्ट के बाद डॉ. दीक्षा गौतम ने बताया कि उनके शरीर में 7.9 ग्राम खून है और वह एनीमिया से ग्रसित हैं। डॉक्टर ने उन्हें पौष्टिक आहार, मौसमी फलों का सेवन करने और दिन में दो बार आयरन की गोली लेने की सलाह दी। साथ ही बताया कि खून नहीं बढ़ने पर आयरन सुक्रोज की डोज दी जाएगी और समय-समय पर जांच कराने को कहा। उन्हें 360 आयरन और 180 कैल्शियम की गोलियां दी गईं।
आयशा बताती हैं कि उनके पति बाहर रहते हैं, इसलिए उनकी मां उनकी देखभाल करती हैं। डॉक्टर ने उनकी मां को गर्भावस्था में विशेष ध्यान रखने और प्रसव के लिए पर्याप्त खून के महत्व के बारे में समझाया। स्टाफ नर्स ने भी उनकी काउंसलिंग की और दिनचर्या में बदलाव, पौष्टिक आहार, समय पर नींद तथा दिन में दो घंटे आराम करने की सलाह दी। आयशा बताती हैं कि अभी उनका आठवां महीना चल रहा है और अब उनका खून बढ़कर 10 ग्राम हो गया है। अब वह पहले से ज्यादा अपना ध्यान रखती हैं, ताकि स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकें। उन्हें संस्थागत प्रसव कराने की सलाह दी गई है और इसके लाभों के बारे में भी बताया गया है।
गर्भावस्था के पांचवें महीने में मुझे काम करते समय बहुत थकान, चक्कर और सांस फूलने की समस्या होने लगी थी। जांच कराने पर पता चला कि मेरा हीमोग्लोबिन केवल 8 ग्राम था। आशा कार्यकर्ता सुनीता और शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र दहतोरा मोड़ की प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ. दीक्षा गौतम ने मुझे नियमित रूप से आयरन और कैल्शियम की गोलियां लेने, पौष्टिक आहार खाने और पर्याप्त आराम करने की सलाह दी। डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मियों की सलाह को मैंने नियमित रूप से अपनाया, जिससे प्रसव के समय मेरा हीमोग्लोबिन बढ़कर 12 ग्राम हो गया। 26 अगस्त 2026 को एसएन मेडिकल कॉलेज में ऑपरेशन द्वारा मैंने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। आज मैं और मेरा बच्चा दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं। समय पर जांच, सही उपचार और परिवार के सहयोग से मेरी गर्भावस्था सुरक्षित रही।
मंडल की महिलाओं में एनीमिया की स्थिति (आंकड़ें प्रतिशत में)
आगरा 59.4
मथुरा 63.0
मैनपुरी 57.8
फिरोजाबाद 57.1










