
रेबीज एक विषाणुजनित जूनोटिक बीमारी है, जो मुख्य रूप से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है। संक्रमित पशु की लार के माध्यम से वायरस मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है। सामान्यतः संक्रमित पशु के काटने या खरोंचने से संक्रमण फैलता है। खुले घाव अथवा आंख, नाक या मुंह जैसे श्लेष्मा झिल्ली के संक्रमित लार के संपर्क में आने से भी संक्रमण का खतरा हो सकता है। संक्रमण के बाद वायरस धीरे-धीरे तंत्रिका तंत्र की ओर बढ़ता है। शुरुआती अवस्था में बुखार, बेचैनी, दर्द या काटे गए स्थान के आसपास असामान्य झुनझुनी, चुभन या जलन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इसके बाद बीमारी मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करने लगती है। कुछ मरीजों में उत्तेजना, बेचैनी, भ्रम और पानी निगलने में कठिनाई जैसे लक्षण दिखाई देते हैं, जबकि कुछ मामलों में धीरे-धीरे लकवा और कोमा की स्थिति बन सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक बार चिकित्सकीय लक्षण विकसित हो जाने के बाद रेबीज का परिणाम लगभग हमेशा घातक होता है।
इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके लक्षण प्रकट होने के बाद यह लगभग शत-प्रतिशत घातक होती है, जबकि संक्रमण के बाद समय पर उचित उपचार शुरू कर दिया जाए तो इसके कारण होने वाली मृत्यु को पूरी तरह रोका जा सकता है। यही विरोधाभास रेबीज को सार्वजनिक स्वास्थ्य की एक महत्वपूर्ण चुनौती बनाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया के 150 से अधिक देशों और क्षेत्रों में रेबीज का जोखिम मौजूद है और हर वर्ष लगभग 59 हजार लोगों की मृत्यु इस बीमारी के कारण होती है, जिनमें बड़ी संख्या बच्चों की होती है। हर वर्ष 28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 की थीम “Stronger Together”, यानी “मिलकर अधिक मजबूत”, रेबीज की रोकथाम में सामूहिक प्रयासों के महत्व को रेखांकित करती है।
रेबीज के इतिहास में फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुई पाश्चर का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने रेबीज के विरुद्ध वैक्सीन विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया और 1885 में एक बच्चे पर रेबीज वैक्सीन का सफल प्रयोग किया गया। इस वैज्ञानिक उपलब्धि ने ऐसी बीमारी के विरुद्ध मानवता को एक प्रभावी सुरक्षा उपाय दिया, जिसे उस समय लगभग निश्चित मृत्यु का कारण माना जाता था। आज रेबीज की रोकथाम के लिए आधुनिक सेल-कल्चर आधारित वैक्सीन उपलब्ध हैं। विज्ञान की प्रगति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि रेबीज से होने वाली अधिकांश मानव मौतों को रोका जा सकता है।
WHO के अनुसार मानव रेबीज के लगभग 99 प्रतिशत मामलों में संक्रमण का स्रोत कुत्ते होते हैं। यही कारण है कि मानव रेबीज को नियंत्रित करने की सबसे प्रभावी रणनीति कुत्तों में बीमारी के प्रसार को रोकना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक कुत्ता रेबीज से संक्रमित होता है या हर कुत्ते के काटने से रेबीज हो जाएगा। लेकिन संभावित जोखिम को नजरअंदाज करना गंभीर गलती हो सकती है। किसी पशु के काटने या खरोंचने की स्थिति में व्यक्ति को यह तय करने के बजाय कि पशु स्वस्थ दिखाई दे रहा है या नहीं, तत्काल चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
रेबीज की रोकथाम में काटे जाने के बाद के शुरुआती मिनट अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। WHO के अनुसार घाव को साबुन और बहते पानी से लगभग 15 मिनट तक अच्छी तरह धोना चाहिए। इसके बाद व्यक्ति को तत्काल स्वास्थ्य केंद्र जाकर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। घाव पर मिट्टी, मिर्च, तेल, राख, चूना या किसी अन्य घरेलू पदार्थ को लगाने जैसी पारंपरिक धारणाएं नुकसान पहुंचा सकती हैं और उपचार में देरी कर सकती हैं। घाव को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि चोट छोटी है या खून कम निकला है। किसी संभावित संक्रमित पशु के काटने या खरोंचने के बाद समय गंवाना सबसे बड़ी भूल हो सकती है।
भारत में रेबीज नियंत्रण का महत्व विशेष है। WHO के भारत संबंधी उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान के 2024 में प्रकाशित अनुमानों के आधार पर देश में हर वर्ष लगभग 91 लाख पशु-काटने की घटनाएं होती हैं, जिनमें तीन-चौथाई से अधिक मामले कुत्तों से जुड़े हैं। इसी अनुमान में हर वर्ष लगभग 5,726 मानव रेबीज मौतों का उल्लेख किया गया है।









