
हर वर्ष 4 अक्टूबर को विश्व पशु दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य पशु कल्याण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और उनके साथ होने वाली क्रूरता, उपेक्षा तथा अमानवीय व्यवहार को रोकने के लिए सामाजिक चेतना विकसित करना है। यह दिन संत फ्रांसिस ऑफ असीसी की स्मृति से भी जुड़ा है, जिन्हें प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति करुणा के लिए जाना जाता है। आज शहरीकरण, प्राकृतिक आवासों में कमी, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से जैव विविधता पर बढ़ते दबाव के बीच यह दिवस मनुष्य और पशु के सह-अस्तित्व तथा प्रकृति के प्रति जिम्मेदार व्यवहार का संदेश देता है।
पालतू पशु हो या पशुधन, वन्यजीव हो या शहरी क्षेत्र में रहने वाला आवारा पशु हर स्थिति में उसके प्रति मानवीय और जिम्मेदार व्यवहार आवश्यक है। पशुओं के प्रति संवेदना का वास्तविक अर्थ उनके जीवन को मनुष्य के उपयोग की वस्तु के रूप में देखने के बजाय एक जीवित प्राणी के रूप में स्वीकार करना है। इसका मतलब यह भी है कि जहां पशुओं का उपयोग कृषि, परिवहन, खाद्य उत्पादन या अन्य मानवीय आवश्यकताओं के लिए होता है, वहां उनके साथ अनावश्यक पीड़ा और क्रूरता न हो।
प्रकृति में कोई भी प्रजाति अनावश्यक नहीं है। हर जीव खाद्य शृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र के किसी न किसी हिस्से में अपनी भूमिका निभाता है। पक्षी बीजों के प्रसार में सहायता करते हैं, अनेक जीव परागण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं और शिकारी प्रजातियां दूसरी प्रजातियों की संख्या को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करती हैं। वन्यजीवों की उपस्थिति जंगलों और अन्य प्राकृतिक आवासों के स्वास्थ्य का संकेत भी देती है।
भारत की विधिक व्यवस्था में पशु कल्याण को महत्वपूर्ण स्थान मिला है। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 का उद्देश्य पशुओं को अनावश्यक पीड़ा और कष्ट से बचाना है। पशु कल्याण बोर्ड इसी कानून के तहत पशु कल्याण संबंधी मामलों में सलाह, जागरूकता और विभिन्न गतिविधियों को बढ़ावा देता है। पशु कल्याण से संबंधित नियमों का दायरा भी व्यापक है। इनमें पशुओं के परिवहन, पालतू पशुओं के व्यापार, पशु जन्म नियंत्रण, पशुपालन की कुछ प्रक्रियाओं और अन्य विषयों से संबंधित नियम शामिल हैं। पशु कल्याण बोर्ड की वर्तमान सूची में 2023 के पशु जन्म नियंत्रण नियम तथा पशुपालन प्रक्रियाओं से जुड़े नियम भी शामिल हैं।









