
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की शुरुआत वर्ष 1992 में वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ की पहल पर हुई थी। इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य को वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं में शामिल करना और इस विषय पर जागरूकता बढ़ाना है। समय के साथ विभिन्न देशों की सरकारों, स्वास्थ्य संस्थानों, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक संगठनों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य केवल मानसिक बीमारी से मुक्त होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भावनात्मक संतुलन, तनाव से निपटने की क्षमता और स्वस्थ सामाजिक संबंध भी शामिल हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में लगभग एक अरब लोग किसी न किसी मानसिक विकार से प्रभावित हैं। अवसाद और चिंता जैसी समस्याओं के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रतिवर्ष लगभग एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की उत्पादकता का नुकसान होता है। इसके बावजूद, विश्व के सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट का औसतन दो प्रतिशत से भी कम हिस्सा मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में उपचार तथा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता इस संकट को और गंभीर बनाती है।
मनुष्य के जीवन की सार्थकता केवल उसकी शारीरिक क्षमता, आर्थिक स्थिति या सामाजिक प्रतिष्ठा से निर्धारित नहीं होती, बल्कि मानसिक संतुलन, भावनात्मक स्थिरता और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सुख-दुख, सफलता-असफलता और संघर्ष जीवन के स्वाभाविक हिस्से हैं। इन परिस्थितियों का सामना करना, अपनी भावनाओं को समझना और दूसरों के साथ स्वस्थ संबंध बनाए रखना मानसिक स्वास्थ्य का अभिन्न अंग है। हालांकि, लंबे समय तक मानसिक परेशानियों को व्यक्तिगत कमजोरी या इच्छाशक्ति की कमी समझा जाता रहा है।
प्रत्येक वर्ष 10 अक्टूबर को मनाया जाने वाला विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने, सामाजिक कलंक दूर करने और सुलभ उपचार सेवाओं को प्रोत्साहित करने का अवसर है। इसका संदेश स्पष्ट है कि मानसिक स्वास्थ्य को स्वास्थ्य व्यवस्था और सार्वजनिक नीतियों में समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए। परिवार, शिक्षण संस्थानों, कार्यस्थलों, समुदायों और सरकारों के समन्वित प्रयासों से ही ऐसा वातावरण बनाया जा सकता है, जहां लोग बिना भय या भेदभाव के सहायता प्राप्त कर सकें।











