
नवरात्र के चौथे दिन आज माँ कुष्मांडा की पूजा की जा रही है। सृजन और जीवन की मूल ऊर्जा का रूप है माँ कुष्मांडा। “या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्माण्डारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥” जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर अंधकार तथा शून्यता व्याप्त थी, तब अपनी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना करने वाली आदिशक्ति के रूप में मां कूष्मांडा की आराधना की जाती है। नवरात्र के चौथे दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि उनकी मुस्कान से सृष्टि में ऊर्जा, प्रकाश और जीवन का संचार हुआ। इसी कारण उन्हें सृजन और चेतना की प्रतीक माना जाता है।
देवी की उपासना आस्था के साथ सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देती है। जीवन में निराशा, भय और अनिश्चितता के क्षण आते हैं, लेकिन आशा की छोटी-सी किरण भी मन में नया उत्साह जगा सकती है। मां कूष्मांडा की दिव्य मुस्कान इसी आशावाद और आंतरिक ऊर्जा का प्रतीक है। उनकी आराधना हमें कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने, विवेक से निर्णय लेने और रचनात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने की सीख देती है। नवरात्र का यह अवसर आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और सकारात्मक संकल्प का संदेश देता है।
मां कूष्मांडा को तेजस्वी, सौम्य और शक्तिशाली देवी के रूप में पूजा जाता है। उन्हें सामान्यतः अष्टभुजाधारी स्वरूप में दर्शाया जाता है, जो उनकी सृजनात्मक शक्ति, सामर्थ्य और संरक्षण का प्रतीक है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृतकलश, चक्र, गदा और जपमाला जैसी वस्तुएं तथा आयुध दिखाई देते हैं।








