आज है “अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस – 15 मई”, भावना, विश्वास, उत्तरदायित्व, सहयोग और सह-अस्तित्व की सजीव अनुभूति से निर्मित एक संवेदनशील, जीवंत और सृजनात्मक संरचना है “परिवार”

परिवार केवल रक्त-संबंधों का यांत्रिक संयोजन नहीं, बल्कि भावनाओं की ऊष्मा, विश्वास की दृढ़ता, उत्तरदायित्व की गंभीरता, सहयोग की सहजता और सह-अस्तित्व की सजीव अनुभूति से निर्मित एक संवेदनशील, जीवंत और सृजनात्मक संरचना है। यही वह पावन आधारभूमि है, जहां मनुष्य जीवन की प्रथम किरण के साथ संसार में प्रवेश करता है, अपने अस्तित्व का प्रारंभिक बोध प्राप्त करता है और जीवन के मूलभूत मूल्यों को आत्मसात करते हुए अपने व्यक्तित्व की नींव रखता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से परिवार वह पवित्र तीर्थ है, जहां व्यक्ति का ‘अहं’ क्रमशः ‘वयम’ में विलीन होने लगता है। यह ‘मैं’ से ‘हम’ की उस सुंदर और सार्थक यात्रा का प्रारंभिक सोपान है, जो मनुष्य को सामूहिकता, समर्पण और सहजीवन के उच्चतर आदर्शों से परिचित कराता है। यही कारण है कि परिवार को ‘समाज की प्रथम पाठशाला’ कहा गया है। यहां अर्जित संस्कार प्रेम की कोमलता, त्याग की उदात्तता, अनुशासन की दृढ़ता, सहानुभूति की संवेदना और उत्तरदायित्व की गरिमा न केवल जीवनपर्यंत साथ रहते हैं, बल्कि व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व को दिशा, गहराई और प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहां पारिवारिक संरचनाएं तीव्र गति से परिवर्तनशील हैं। जैसे एकल परिवारों का बढ़ता प्रचलन, प्रवासन की प्रवृत्ति और डिजिटल जीवन शैली का प्रभाव इस दिवस की प्रासंगिकता और भी अधिक गहन हो जाती है। यह हमें न केवल परिवार के पारंपरिक मूल्यों को पुनः समझने के लिए प्रेरित करता है, बल्कि उन्हें समयानुकूल सुदृढ़ और संरक्षित करने का अवसर भी प्रदान करता है, ताकि बदलते युग में भी परिवार संस्था अपनी स्थिरता और गरिमा बनाए रख सके।

परिवार की इसी सार्वभौमिक महत्ता को दृष्टिगत रखते हुए United Nations ने वर्ष 1993 में एक दूरदर्शी और महत्वपूर्ण पहल की। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रतिवर्ष 15 मई को ‘अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की, ताकि वैश्विक स्तर पर परिवार संस्था के महत्व को रेखांकित किया जा सके। इस दिवस का उद्देश्य मात्र औपचारिक उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्व समुदाय को परिवारों की वर्तमान स्थिति, उनके समक्ष उपस्थित बहुआयामी चुनौतियों तथा उनके सामाजिक-आर्थिक योगदान के प्रति जागरूक करने का सशक्त माध्यम है। यह दिन सरकारों, नीतिनिर्माताओं और समाज के प्रत्येक वर्ग को यह स्मरण कराता है कि परिवार केवल निजी जीवन की सीमित इकाई नहीं, बल्कि सुदृढ़ समाज और सशक्त राष्ट्र निर्माण की मूलभूत आधारशिला है।

भारत में परंपरागत रूप से संयुक्त परिवार प्रणाली का व्यापक प्रचलन रहा है, जिसमें अनेक पीढ़ियां एक ही छत के नीचे साथ रहती हैं। यह व्यवस्था केवल साथ रहने तक सीमित नहीं, बल्कि सहयोग, सामूहिक उत्तरदायित्व, परस्पर सम्मान और त्याग की भावना को सुदृढ़ करती है। संयुक्त परिवार जीवन के उतार-चढ़ाव में एक मजबूत सहारा प्रदान करता है और सामूहिकता की भावना को जीवंत बनाए रखता है।

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