
नई दिल्ली।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय में 10 हजार से अधिक मामले 10 साल से लंबित पड़े हुए हैं तथा देश के 25 उच्च न्यायालयों में 80,000 से अधिक मामले 30 वर्षों से लंबित पड़े हुए हैं। लोगों की पीढ़ियां बदल गई हैं लेकिन मुकदमों के फैसले नहीं आये। पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाया। ये हाल तो जब है जबकि न्यायालयों को आधुनिक और तीव्रगामी बनाने के लिए साल 2011 में 10 हजार करोड़ रूपये खर्च किये गए तथा उसके बाद भी लगभग इतने ही पैसे खर्च किये जा चुके हैं। लेकिन अभी तक व्ही हाल है की लोगों की जूतियां खिसकर फट जाती हैं, जमीन बिक जाती हैं लेकिन न्याय नहीं मिल पाता है।
पिछले हफ्ते संसद में एक सवाल के लिखित जवाब में, कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लंबित मामलों के निपटारे की जिम्मेदारी न्यायपालिका पर डाली, उनका कहना है कि कोर्ट ने इनके निपटारे के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की है। उन्होंने आगे कहा, “कोर्ट में मामलों का समय पर निपटारा कई बातों पर निर्भर करता है, और इसमे, पर्याप्त संख्या में जजों और न्यायिक अधिकारियों की उपलब्धता, कोर्ट का सहयोगी स्टाफ और भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर, मामलों की जटिलता, सबूतों की प्रकृति, स्टेकहोल्डर्स (जैसे बार, जांच एजेंसियां, गवाह, मुकदमेबाज) का सहयोग और नियमों तथा प्रक्रियाओं का सही पालन, शामिल होता है।”
हालांकि सुप्रीम कोर्ट खाली पड़े पदों पर जजों की नियुक्ति में तेजी दिखा रहा है, लेकिन 25 हाई कोर्ट और निचली अदालतों में स्थिति वैसी नहीं है। हाई कोर्ट में जजों के 1,122 स्वीकृत पदों के मुकाबले 341 पद खाली हैं। निचली अदालतों में तो स्थिति और विकट है, यहां पर जजों के 30,868 स्वीकृत पदों के मुकाबले 7,311 पद खाली हैं। इसके चलते अदालतों में जजों पर फाइलों का बोझ बढ़ता जा रहा है और जनता अदालतों के चक्कर काटते हुए अपने सैर पीट रही है।












