एक समय – मुख्यमंत्री के पड़ोसी थे, 100 से अधिक फ़िल्मों में काम किया, 20 फिल्में खुद बनाईं। लेकिन आज – वृद्ध आश्रम में रहते हैं, दवाई के भी पैसे नहीं 

एक समय की बात – मुख्यमंत्री के पड़ोसी थे, 100 से अधिक फ़िल्मों में काम किया, 20 फिल्में खुद बनाईं।। आज की बात – वृद्ध आश्रम में रहते हैं, दवाई के भी पैसे नहीं हैं। सुनने में कितना अजीब और झूंठ लग रहा है? लेकिन ये 100% सच है।

ये कोई किताबी किस्सा कहानी या फिल्मी कहानी नहीं है बल्कि दक्षिण भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता-निर्माता रहे मोहन शर्मा के जीवन की हकीकत है, जोकि वास्तव में किसी भी इंसान को झकझोर सकती है। ये घटना इंसान को यह आईना दिखा रही है कि इंसान के वश में कुछ भी नहीं है। समय की लाठी में कोई आवाज नहीं होती, लेकिन मार भयानक हो सकती है। समय चक्र या भाग्य चक्र कब किसको चक्रवात में फंसा देगा, कोई नहीं जान सकता।

प्रदीप के एक भजन में साफ साफ कहा गया :

“”इस दुनिया में भाग्य के आगे चले ना किसी का पाय। कागज हो तो हर कोई बांचे, भाग्य ना बांचा जाय।।

एक दिन इसी किस्मत के कारण, वन को गए रघुराई। कर्म का लेख मिटे ना रे भाई।

कोई लाख करे चतुराई रे, कर्म का लेख मिटे ना रे भाई””

सफलता और स्टारडम की कोई पक्की गारंटी नहीं होती। एक छोटी सी चूक या आर्थिक घाटा इंसान को रातों-रात अर्श से फर्श पर लाकर खड़ा कर सकता है। भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसे कई कलाकार हुए हैं जिन्होंने अपने समय में अपार लोकप्रियता हासिल की, लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव में वे गुमनामी और बदहाली का शिकार हो गए। ऐसी ही एक दुखद और झकझोर देने वाली कहानी है दक्षिण भारतीय सिनेमा के बहुमुखी कलाकार, निर्माता और निर्देशक मोहन शर्मा की। आज मोहन शर्मा चेन्नई के पास गुम्मीदीपूंडू के वृद्ध आश्रम में रहते हैं।

अपने सफल करियर के दौरान उन्होंने लगभग 20 फिल्मों का निर्माण किया और 100 से अधिक फिल्मों में बतौर मुख्य अभिनेता काम किया। इसके अलावा, उन्होंने विभिन्न भाषाओं की 50 से अधिक फिल्मों में सशक्त चरित्र भूमिकाएं निभाईं। सिनेमा उद्योग में उनका कद इस बात से समझा जा सकता है कि वे दक्षिण भारत की सभी चार प्रमुख भाषाओं तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ में फिल्में बनाने वाले पहले निर्माता थे। उन्होंने साउथ इंडियन फिल्म चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं।

एक समय में तमिल, तेलुगु और मलयालम सिनेमा में अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले मोहन शर्मा आज चेन्नई के एक ओल्ड एज होम में गुमनामी और बीमारियों से भरा जीवन जीने को मजबूर हैं। जिस इंसान ने दर्जनों फिल्मों का निर्माण किया और सौ से अधिक फिल्मों में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभाई, आज वह अपनी दवाइयों के मासिक खर्च के लिए भी दूसरों पर निर्भर है।

“विश्व मित्र परिवार” संस्था उनकी मदद के लिए कोष बना रही है। जिससे छोटी-छोटी सहयोग राशि मिलाकर उनकी सहायता की जा सके। हम इस राशि को चंदा या दान नहीं बल्कि सहयोग कहेंगे, जिससे हम सम्मान के साथ उनकी मदद कर सकते हैं। संस्था का QR CODE नीचे दिया गया है जिससे आप कोई भी आसानी से सहयोगी बन सकते हैं।

आर्थिक तंगी के बीच स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं ने मोहन शर्मा की कमर तोड़ दी। पैर में गांठ (ग्रोथ) की वजह से उनकी सर्जरी हुई, जिसके कारण उनका चलना-फिरना बंद हो गया था। लिगामेंट टियर के इलाज और सर्जरी, वर्टिगो (चक्कर आना), उच्च रक्तचाप और डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। उन्हें रोज इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं। उनके अनुसार केवल दवाइयों का खर्च ही लगभग 35000 रुपये महीना आता है। जब उनके पास दवाइयां खरीदने तक के पैसे नहीं बचे, तब रोटरी क्लब के उनके कुछ दोस्तों ने, जो ओल्ड एज होम के ट्रस्टी थे, उन्हें वहाँ रहने का सुझाव दिया।

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