
वृद्धजन केवल उम्र के एक पड़ाव पर पहुंचे लोग नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण के लंबे अनुभव के वाहक हैं। “बुढ़ापा जीवन का अवसान नहीं, बल्कि अनुभवों का शिखर है।” उम्र का बढ़ना जीवन की स्वाभाविक और अपरिहार्य प्रक्रिया है, लेकिन बदलती जीवन शैली, तेजी से बढ़ती तकनीक, एकल परिवारों की प्रवृत्ति और भागदौड़ भरी जिंदगी ने वृद्धावस्था से जुड़ी सामाजिक चुनौतियों को नया स्वरूप दिया है। ऐसे समय में 1 अक्टूबर का अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस हमें ठहरकर यह सोचने का अवसर देता है कि क्या हम अपने बुजुर्गों को केवल देखभाल और सहानुभूति के पात्र के रूप में देख रहे हैं, या उन्हें समाज की मुख्यधारा में सक्रिय, सम्मानित और अधिकार-संपन्न भागीदार का स्थान दे रहे हैं।
वृद्धजनों में जीवन का अनुभव, ज्ञान, परंपराओं और सामाजिक स्मृतियों में ऐसी पूंजी निहित है, जिसका लाभ नई पीढ़ी को मिलता है। वृद्ध आबादी का बढ़ना केवल चिकित्सा क्षेत्र की उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक और जनसांख्यिकीय परिवर्तन का परिणाम भी है। मृत्यु दर में कमी, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, जीवन प्रत्याशा में वृद्धि और प्रजनन दर में गिरावट ने दुनिया की आयु संरचना को बदल दिया है। पहले जहां बड़ी आबादी कम उम्र में ही जीवन की चुनौतियों से जूझती थी, वहीं आज अधिक लोग लंबा जीवन जी रहे हैं। भारत भी इस बदलाव से अछूता नहीं है।
साल 2022 में भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या लगभग 15.3 करोड़ थी। इसके 2050 तक बढ़कर लगभग 34.7 करोड़ होने का अनुमान है। यानी आने वाले दशकों में भारत की सामाजिक संरचना में वृद्धजनों की भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।
बढ़ती उम्र में उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, दृष्टि और श्रवण संबंधी समस्याएं, हड्डियों और गतिशीलता से जुड़ी परेशानियां तथा डिमेंशिया जैसी स्थितियों का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए वृद्ध स्वास्थ्य नीति का लक्ष्य केवल बीमारी का उपचार नहीं, बल्कि बीमारी की रोकथाम, समय पर जांच, पुनर्वास और लंबे समय तक स्वतंत्र जीवन जीने की क्षमता को बनाए रखना होना चाहिए। इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर बड़े अस्पतालों तक जेरियाट्रिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना आवश्यक है। नियमित स्वास्थ्य जांच, उचित पोषण, शारीरिक सक्रियता, योग या व्यायाम, पर्याप्त नींद और सामाजिक संपर्क वृद्धावस्था को अधिक स्वस्थ और सक्रिय बनाने में मदद कर सकते हैं।
वृद्धजनों को केवल भोजन, दवा और आवास उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। उन्हें बातचीत, अपनापन, निर्णयों में भागीदारी और सामाजिक सक्रियता की भी आवश्यकता होती है। सामुदायिक केंद्र, वरिष्ठ नागरिक क्लब, पुस्तकालय, सांस्कृतिक गतिविधियां, धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं की सकारात्मक भूमिका तथा पीढ़ियों के बीच संवाद इस दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।









