
-रितेश सिन्हा
विधानसभा उपचुनावों के नतीजों से गुजरात कांग्रेस का सच सबसे सामने है। पार्टी की दोनों सीटों पर करारी हार से बुरी तरफ फजीहत हुई। बड़े दवाब में आकर शक्ति सिंह गोहिल ने पद छोड़ दिया। शक्ति सिंह गोहिल से टीम राहुल पहले से ही काफी नाराज थी। पिछले राज्यसभा चुनाव में भी दिवंगत अहमद पटेल ने मरहूम पूर्व सांसद और आईवाईसी अध्यक्ष रहे राजीव सातव को राज्यसभा देने के एवज में शक्ति सिंह गोहिल को टिकट जबरन करवा लिया था। आज भी अहमद पटेल के दौर में ग्रुप 23 की अगुवाई गोहिल कर रहे हैं। उनका सिक्का आज भी कांग्रेस में चलता है। पार्टी अध्यक्ष खड़गे और प्रभारी वासनिक अहमद के दौर से ही इनके दरबारी रहे हैं।
पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष व लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मार्च 2025 में हुई गुजरात कांग्रेस की बैठक में सरेआम बाराती घोड़ा कहकर इन पर तंज कसा था। उम्मीद थी और इसके बाद कयास लग रहे थे कि शक्ति सिंह गोहिल अपने पद से इस्तीफा देंगे और प्रदेश को नया अध्यक्ष मिलेगा। मगर खड़गे और वासनिक इनको बचाने में कामयाब रहे। बिहार प्रभारी बनने के बाद टीम राहुल के चहेते नेता को अध्यक्ष बनाने की बजाय इन्होंने राजद से आए अखिलेश को कमान सौंपने में बड़ी भूमिका निभाई। अखिलेश को दो बार राज्य सभा दिलाने में भी गोहिल की भूमिका से भी राहुल काफी नाराज थे। यही वजह है कि राहुल ने स्लीपर सेल और बाराती घोड़ा कहकर सनसनी फैला दी थी, लेकिन गोहिल पर खड़गे और वासनिक का असर था, लिहाजा वे पद पर बने रहे।
इन उपचुनावों में गोहिल बुरी तरह फंसे नजर आए। उनके नेतृत्व में गुजरात कांग्रेस केवल दो सीटों पर लड़ी। त्रिकोणीय मुकाबले में भी विसाबदार में 3 फीसदी से कुछ अधिक वोटों लेकर कांग्रेस अपनी औकात पर आ गई। आम आदमी पार्टी का दबदबा दिल्ली, पंजाब के बाद गुजरात में भी दिखा। गोहिल आम आदमी पार्टी के साथ चुनावी समझौते का विरोध करते आए हैं। उपचुनाव के दौरान दोनों सीटों पर हाईकमान को गोहिल बड़े अंतर से जीत का झांसा दे रहे थे। गुजरात उपचुनाव के नतीजों ने उन्हें भाजपा का स्लीपर सेल होने की पुष्टि कर दी और अपने आप को इन चुनाव में कांग्रेस का बाराती घोड़ा ही साबित किया।
मैनेजमेंट और मीडिया के बड़े खिलाड़ी बने शक्ति सिंह गोहिल अपने बड़बोलेपन में आज भी पीछे नहीं हैं। मीडिया में मोदी विरोध के स्वयंभू चैंपियन और राज्यसभा सांसद गोहिल को टीम राहुल ने पिछले दिनों बाहर करने का दवाब बनाया था। मगर पूरी कांग्रेस को अपनी राजनीति में उलझाकर खड़गे को आगे करते हुए एक दिन का एआईसीसी सेशन अहमदाबाद में रखवा दिया। उस सत्र से कांग्रेस को क्या लाभ हुआ, इसका गुणा-भाग करने में अब तक कांग्रेसी उलझे थे। लेकिन गोहिल ने बड़ी समझदारी के साथ अपनी सियासी दांव में अपनी सीडब्लूसी और प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी बचा ली थी। इसका सारा खर्चा उन्होंने खुद वहन किया था। उपचुनाव में मिली शिकस्त ने उनको पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
गुजरात में उनकी सियासी हनक तो चली गई, लेकिन सनक अब भी बाकी है। उन्होंने अपने पद छोड़ने का बकायदा संवाददाता सम्मेलन में ऐलान किया और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, गुजरात के प्रभारी मुकुल वासनिक का कद नापते हुए खुद ही अपना उत्तराधिकारी शैलेश परमार को कार्यवाहक अध्यक्ष भी नियुक्त कर दिया। कांग्रेस के अब तक के इतिहास में पहला नमूना है जिसमें पद छोड़ने वाला अपना उत्तराधिकारी तय कर कांग्रेस अध्यक्ष और प्रभारी महासचिव को निर्देश देता है। की देखना है कि मुकुल वासनिक और खड़गे और नेता प्रतिपक्ष कब तक इनको वर्किंग कमिटी में झेलते रहेंगे। गुजरात कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि बिहार के पूर्व अध्यक्ष व राज्यसभा सांसद अखिलेश सिंह के नकारात्मक रवैये से दुखी होकर जीरो से हीरो बनाते हुए उन्हें सीडब्लूसी में सजाया गया है। वैसे बिहार में भी प्रभारी रहते हुए गोहिल ने प्रदेश से कांग्रेस का सुपड़ा ही साफ करवाया था। खड़गे के खासमखास गोहिल को किस प्रदेश के प्रभारी की जिम्मेदारी देते हुए उसे कबाड़ा करने का पूरा अवसर प्रदान किया जाएगा, इस पर कांग्रेसियों के अलावा राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें बनी रहेगी।








