शिक्षक दिवस पर अपने करियर को मां के संस्कारों ने शिक्षा से दे ऊंची उड़ान

मां की गोद से सृजन का पाठ: शिक्षक दिवस पर मानव जीवन के प्रथम गुरु का सम्मान
 
✍️डॉ.नयन प्रकाश गांधी ,
अंतरराष्ट्रीय एलएलपी लाइफ करियर कोच 
“मां की शिक्षा, संस्कार और प्रेरणा से बनते हैं महान व्यक्तित्व – शिक्षक दिवस पर मातृत्व को समर्पित विमर्श”
“नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा॥”
मां मनुष्य जीवन की सबसे पहली और सबसे महान शिक्षक है। भारतीय संस्कृति में मां को “मातृ देवो भवः” का दर्जा मिला है, जिसकी गोद में बच्चा अपने व्यक्तित्व की नींव रखता है। मां के द्वारा दिये संस्कार ही आगे चलकर बच्चे को समाज और राष्ट्र का अच्छा नागरिक बनाते हैं।
मां की शिक्षा सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं, वह व्यवहार, संस्कार, संयम, आदर तथा जिम्मेदारी सिखाती है। जीवन के हर संकट में मां पहला समाधान सिखाती है। उसके संवाद, स्पर्श और उपदेश जीवन भर व्यक्ति को संभालते हैं। देव संस्कृति विश्विद्यालय शांतिकुंज हरिद्वार से व्यक्तित्व परिष्कार में प्रशिक्षित एलुमनाई एवं साथ ही अंतरराष्ट्रीय एनएलपी लाइफ करियर कोच डॉ. नयन प्रकाश गांधी मानते हैं कि अगर हम महान व्यक्तित्व की जीवनी को पढ़ें, समझें तो पाएंगे कि उनके महान कार्यों के पीछे पहली शिक्षक उनकी माता का बड़ा योगदान था।
उनके जीवन की सफलता की नींव मां की शिक्षा एवं प्रेरणा ही रही है।महापुरुषों के जीवन में मां का योगदान हमेशा अद्वितीय रहा है। छत्रपति शिवाजी को बचपन से जो साहस, त्याग और राष्ट्रधर्म के संस्कार मिले, वह उनकी मां जीजाबाई की देन थी। महात्मा गांधी की सत्य और अहिंसा की सोच के पीछे उनकी मां पुतलीबाई की धार्मिकता और नैतिक शिक्षाएं थीं। थॉमस अल्वा एडिसन के वैज्ञानिक बनने की नींव उनकी मां नैनसी एडिसन के प्रोत्साहन और विश्वास ने रखी। मार्टिन लूथर किंग जूनियर के भीतर अन्याय से लड़ने और न्याय के लिए संघर्ष की प्रेरणा उनकी मां अलबर्टा किंग से आई।
मां बच्चे की पहली दोस्त, पहली गुरु, पहली मार्गदर्शिका है। उसकी सीख खुद बच्चे की पहचान, उसकी सोच और कर्म का हिस्सा बन जाती है। सेवा, समर्पण और त्याग के पाठ सिखाकर मां अपने बच्चे को मजबूत बनाती है। स्कूल के शिक्षक और समाज का गुरु बाद में आता है, पर जीवन के हर मूल सवाल का पहला जवाब मां ही देती है। संस्कृत साहित्य, पुराणों और शास्त्रों में मां के महत्व की बार-बार पुष्टि की गयी है – “मातृमान् पितृमानाचार्यवान् पुरुषो वेदः” अर्थात जिसे मां, पिता और गुरु का साथ मिले, वही ज्ञानवान है। लेकिन, इस श्रृंखला का पहला सूत्र हमेशा मां होती है, जो जीवन के हर क्षेत्र में सीखने की शुरूआत करती है।
मां से बढ़कर कोई शिक्षक नहीं। उसकी शिक्षा का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता, और उसका ऋण मानव जीवन कभी चुकता नहीं कर सकता। अतः, जीवन में मां की शिक्षा, संस्कार और मार्गदर्शन का आदर करना हर इंसान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। शिक्षक दिवस के पावन पर्व पर मां के सृजन और संस्कार की पूज्यता को नमन करते हुए जीवन की पहली गुरु को सच्चा सम्मान अर्पित करें।
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