
रक्तदान महादान है जो सीधे जीवन प्रदान करता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में इसे ‘महादान’ की संज्ञा दी गई है। रक्त वह अमूल्य जैविक संपदा है जिसका कोई कृत्रिम विकल्प आज तक विज्ञान विकसित नहीं कर पाया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान चाहे कितनी भी प्रगति कर चुका हो, फिर भी रक्त के स्थान पर प्रयोगशाला में निर्मित कोई पदार्थ मानव जीवन को पूर्ण रूप से प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।
दुर्घटनाओं, जटिल शल्यक्रियाओं, प्रसवकालीन जटिलताओं, कैंसर, थैलेसीमिया, हीमोफीलिया तथा अनेक गंभीर रोगों के उपचार में रक्त की आवश्यकता जीवन और मृत्यु के बीच निर्णायक अंतर उत्पन्न करती है। ऐसे समय में स्वैच्छिक रक्तदाता किसी देवदूत की भांति सामने आता है और उसकी एक छोटी-सी पहल किसी परिवार के लिए नई आशा लेकर आती है।
इसी मानवीय चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व और स्वास्थ्य सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करने के लिए प्रतिवर्ष 14 जून को विश्व रक्तदाता दिवस मनाया जाता है। यह दिवस केवल रक्तदान को बढ़ावा देने का अवसर नहीं है, बल्कि उन करोड़ों निस्वार्थ रक्तदाताओं के प्रति वैश्विक कृतज्ञता व्यक्त करने का भी अवसर है जो बिना किसी अपेक्षा के मानव जीवन की रक्षा में योगदान देते हैं। आज जब विश्व के अनेक देशों में सुरक्षित रक्त की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, तब रक्तदान केवल एक स्वास्थ्य विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक सहभागिता, मानवीय करुणा और वैश्विक एकजुटता का प्रतीक बन चुका है।
विश्व रक्तदाता दिवस की शुरुआत वर्ष 2004 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज, इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ ब्लड ट्रांसफ्यूजन तथा फेडरेशन ऑफ ब्लड डोनर ऑर्गेनाइजेशंस के संयुक्त प्रयासों से हुई। वर्ष 2005 में विश्व स्वास्थ्य सभा ने इसे आधिकारिक वैश्विक स्वास्थ्य दिवस के रूप में मान्यता प्रदान की।
14 जून की तिथि का चयन महान वैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार विजेता Karl Landsteiner के सम्मान में किया गया, जिनका जन्म इसी दिन हुआ था। उन्होंने वर्ष 1901 में ABO रक्त समूह प्रणाली की खोज की, जिसने रक्ताधान की प्रक्रिया को सुरक्षित और वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।










