फिरोजाबाद।
सारे भारत में मशहूर हज़रत हमीदुद्दीन शाह सूफी़ रह0 का 807वां उर्स हर साल की तरह इस साल भी बहुत धूम धाम से मनाया जा रहा है। आज उर्स के पहले दिन चादर पोशी के बाद भव्य मुशायरे का आयोजन किया गया। मुशारे का उदघाटन ज़ुल्फ़िकार अहमद इन्जीनियर ने किया अध्यक्षता डा० शमीम अहमद खां ने की एंव मुख्य अतिथि तहसीलदार रवीश कुमार व विमलेश कुमार त्रिपाठी एस०ओ० बसई मोहम्मदपुर थे।
विशिष्ट अतिथि नायब तहसीलदार हिर्देश कुमार थे। मुशायरा की शमा रौशन हाजी मुनीर अहमद ने की।मुशायरे में शहर तथा बाहर के कई मशहूर शायरों ने भाग लेकर मुशायरे को सफ़लता की ऊंचाइयों तक पहुंचाया ।
कार्यक्रम का आरम्भ हाफि़ज़ आदिल ने तिलावते कलाम पाक पढ़कर किया उसके बाद अनवर अमान अकबराबादी ने नाते पाक *(नबी की तारीफ)** पढ़ते हुए कहा :-
“या रब हमारी आंखौं को इतनी रसाई दे-
हम को यहीं से गुम्भदे खि़ज़रा दिखाई दे”
हाफिज आदिल साहब ने नाते नबी में यूं कहा–
“जिस नबी के हाथों में किस्मत-ए-ख़ुदाई है
मैं यक़ीं से कहता हूं ज़ात-ए-मुस्तफ़ाई है”
उसके बाद उमर पैकर ने ग़ज़ल पढ़ते हुए कहा–
“वो मुझको तीराशबी से रिहाई देता है
सरापा चांद की सूरत दिखाई देता है”
शायर कलीम नूरी ने सामाजिक एकता का संदेश देते हुऐ कहा–
“मिल-जुल के ज़माने से अंधेरों को मिटाऐं-
हर मोड़ पै इक दीप मुहब्बत का जलाऐं”
चाहत फीरोजाबादी ने शाह सूफी रह०अ०के लिये शेर पढ़ा—
, “ख़ुदा परस्तौं की ज़िंदा निशानियां है यही
कि जंगलों में भी मेला दिखाई देता है”
शायर असलम अदीब ने शाह सूफी की शान में यूँ कहा—–
“बादशाहों की है जबीनों पर
ख़ाक वालियों के आस्ताने की”
अकबराबाद से पधारे शायर अमान अकबराबादी को खूब पंसंद किया गया उन्होंने गज़ल पढ़ते हुए कहा
‘” ये काम कितने सलीक़े से कर गया कोई
नज़र के रास्ते दिल में उतर गया कोई”
हाजी ऐजाज ने फ़रमाया—
“ज़रूरत जब भी पड़ती है खुदा से मांग लेता हूं –
मुझे ग़ैरों के आगे हाथ फैलाना नहीं आता”
आगरा से पधारी शायरा शमीम कौसर को बार बार सुना गया उनसे की कई ग़ज़लें सुनी गईं उन्होंने कहा-
“वो रज़िया सुल्ताना हो या हो झांसी की रानी
सौ दुश्मन पर भारी है इक औरत हिंदुस्तानी”
कमर वारसी ने तरन्नुम भरे लहजे में कहा —–
” वफा के शौक़ में दाग़े वफ़ा लिया मैंने
मिला न फूल तो कांटा उठा लिया मैंने ”
मंज़र नवाब ने अपना दर्द यूँ बयां किया—–
“गलत कहते हैं सब ससुराल में आराम मिलता है
हमैं तो कै़द खाने में बड़ी तकलीफ़ होती है”
हास्य व्यंग के मशहूर उस्ताद शायर जीरो बांदवी साहब ने पब्लिक को खूब ह़साया उन्होने कहा–
“शाहर्रूख और सलमान तो मेरे चेले हैं –
मैंने हर मैदान में पापड़ बेले हैं”
हर वन्डे में मैंने जान बचाई है
एक-एक बौल पर दो-दो छक्के पेले हैं
अख़्तर दहलवी ने यूं कहा—–
“सरआंखों पे तेरी क़सम ले लिया है
ख़ुशी जान कर तेरा गम ले लिया है”
हाफिंज़ नोमान साहब ने ग़ज़ल पढ़ते हुए कहा
“अपने चेहरे की धूल साफ करो
आईना तोड़ने से क्या होगा”
सभी शायरौं ने अपने कलाम से खूब वाह वाही लूटी , मुशायरा देर रात तक चला, लोग दिल थाम कर बैठे रहे ,
अंत में मुख्य अतिथि तहसीलदार सदर रवीश कुमार जी ने कहा कि मुशायरे सामाजिक ऐकता का स़देश देते हैं, इन से जहां भाषा की तरक्की होती है वहीं भाई चारा भी का़यम होता है ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन होते रहना चाहिये आज के मुशायरे में शायरौं ने अपने कविता से भाई चारे का संदेश दिया है। मुशायरा के अध्यक्ष डाक्टर शमीम अहमद खान ने कहा कि उर्श में प्रशान का कार्य शरानीय रहा है यमुना का जल स्तर बढा हुआ था उसके बावजूद भी प्रशाशन ने बखूबी सब सम्भाल लिया ,आज के मुशायरे में दूर-दूर से आये शायरौं ने बेहतरीन कलाम पेश किये हैं।मुशायरा बहुत कामयाब रहा है, उर्स कमैटी बधाई की पात्र है। मुशायरा का सफल संचालन उस्ताद ज़ीरो बांदवी साहब ने किया।
उर्स कमैटी की तरफ से हाजी मुनीर अहमद ने कहा हर साल की तरह इस बार भी मुशायरा बहुत शानदार रहा उन्होंने सभी शायरौं और श्रोताओं का शुक्रिया अदा किया।





