नई दिल्ली।
पीएम मोदी ने कहा कि 1000 वर्ष पहले लुटेरा महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका। पीएम मोदी ने पोस्ट में कहा कि सन् 1026 में, आज से लगभग एक हजार वर्ष पहले, सोमनाथ मंदिर पर पहला आक्रमण हुआ। उस समय के अत्याचार का उल्लेख कई ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है। इन्हें पढ़कर मन दुख से भर उठता है। हर जगह हिंसा और पीड़ा की छाप दिखाई देती है, जिसका दर्द आज भी महसूस किया जा सकता है।
उस दौर में इस घटना का भारत और यहां के लोगों के मनोबल पर गहरा असर पड़ा होगा। सोमनाथ मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं था, बल्कि उसका आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व बहुत बड़ा था। वह लोगों को जोड़ता था और एक समृद्ध समाज का प्रतीक था। समुद्री व्यापारी इसकी समृद्धि की कहानियां दूर-दूर तक ले जाते थे। इतने हमलों और लंबे गुलामी काल के बावजूद सोमनाथ की कहानी केवल विनाश की नहीं है। यह हजार वर्षों से चले आ रहे भारतीय स्वाभिमान, आस्था और संघर्ष की कहानी है। सोमनाथ मंदिर पर हुए हर आक्रमण पर लोगों ने साहस दिखाया, बलिदान दिए और मंदिर को फिर से खड़ा किया। यही भारत की शक्ति है।
पीएम मोदी ने कहा कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई। उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की, कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे।
पीएम मोदी ने आगे कहा, “तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी। लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया। सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है। उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था। सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’, अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।”







