विश्व में जल संकट, भारत विश्व का सबसे बड़ा भूजल उपभोक्ता, शहरीकरण के कारण भूजल पुनर्भरण में बाधा, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान डार्क जोन में पहुंचे 

नई दिल्ली।

भारत विश्व का सबसे बड़ा भूजल उपभोक्ता है। यहां तेजी से बढ़ रहे शहरीकरण के कारण भूजल पुनर्भरण में बाधा आ रही है। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि पंजाब, हरियाणा और राजस्थान डार्क जोन में पहुंच चुके हैं। यदि तुरंत आवश्यक कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति बेकाबू हो सकती है।

आज नदियां करुण स्वर में सिसक रही हैं, झीलें अपने अस्तित्व के अंतिम क्षण गिन रही हैं और धरती की गहराइयों में छिपा भूजल निरंतर दूर होता जा रहा है। जिस सभ्यता का उदय जल के सान्निध्य में हुआ, वही आज जल संकट की विभीषिका से जूझने को विवश है। यह परिस्थिति केवल प्राकृतिक असंतुलन का परिणाम नहीं, बल्कि अनियंत्रित विकास, उपभोगवादी मानसिकता और पर्यावरण के प्रति हमारी निरंतर उपेक्षा का परिणाम है।

गंगा, यमुना, सिंधु और नील जैसी नदियां अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। अतिक्रमण, प्रदूषण और अत्यधिक दोहन ने इन्हें कई स्थानों पर नालों में बदल दिया है। भारत में भी बेंगलुरु, उदयपुर और दिल्ली की अनेक झीलें कंक्रीट के जंगलों में विलुप्त हो रही हैं। भूजल का क्षय-भूजल, जिसे अदृश्य जल भंडार कहा जाता है, सबसे तेजी से समाप्त हो रहा है। यह संकट इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसका प्रभाव तुरंत दिखाई नहीं देता, परंतु इसके परिणाम दीर्घकालिक और विनाशकारी रूप धारण करके सामने आते हैं।

जल चक्र का असंतुलन-जल चक्र, जो वर्षा, वाष्पीकरण और पुनर्भरण के माध्यम से संतुलन बनाए रखता है, अब अस्थिर हो चुका है। प्रमुख प्रभाव-हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। मानसून अनियमित हो गया है। सूखा और बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं। वाष्पीकरण दर में वृद्धि। अब बारिश “संतुलित” नहीं, बल्कि “अत्यधिक और असमान” हो रही है। कुछ क्षेत्रों में बाढ़, तो कुछ में भीषण सूखा।

इस वैश्विक संकट से निपटने के लिए बहुआयामी और सतत दृष्टिकोण आवश्यक है। हर घर, हर भवन में वर्षा जल संचयन अनिवार्य किया जाए। जल का पुनर्चक्रण। अपशिष्ट जल को शुद्ध कर उद्योग और सिंचाई में पुनः उपयोग किया जाए। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा दिया जाए “पर ड्रॉप, मोर क्रॉप”। पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन हेतु तालाब, बावड़ी और कुओं को पुनर्जीवित करना होगा। जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाना होगा।

प्राकृतिक जल प्रणालियाँ अब अपनी क्षमता से अधिक उपयोग के कारण पुनर्जीवित नहीं हो पा रही हैं। ईरान, इराक, सीरिया और अमेरिका के कुछ हिस्सों में भीषण सूखा (मेगाड्राउट) स्थिति को बदतर बना रहा है। हिमालय में काला धुआं (ब्लैक कार्बन) ग्लेशियरों के पिघलने की गति को 20-25% बढ़ा रहा है, जिससे भविष्य के जल स्रोत खतरे में हैं।

2030 तक, भीषण जल संकट के कारण लगभग 70 करोड़ लोगों के विस्थापन की आशंका है। भारत के नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, देश के लगभग 600 मिलियन लोग उच्च जल तनाव का सामना कर रहे हैं और 21 प्रमुख शहर “डे-ज़ीरो” की स्थिति के करीब हैं, अर्थात इन शहरों में पानी बिल्कुल खत्म होने के कगार पर है, इसका प्रमुख कारण-अंधाधुंध दोहन (ट्यूबवेल, बोरवेल)। जल-गहन फसलें (धान, गन्ना)। वर्षा जल संचयन का अभाव है। शहरीकरण के कारण भूजल पुनर्भरण में बाधा। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में स्थिति “डार्क ज़ोन” तक पहुंच चुकी है।

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