
अमेरिका लाख कोशिशों के बावजूद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुलवा नहीं पाया है। सीजफायर से मिडिल ईस्ट युद्ध पर दो हफ्ते का ब्रेक लगा है। लेकिन देखा जाए तो इस युद्ध में छोटे से देश ईरान ने सुपरपावर अमेरिका को घुटनों पर ला दिया है। सीजफायर के लिए ईरान अपनी 10 शर्तों पर तैयार हुआ है। ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने के लिए तो तैयार हुआ है लेकिन टोल टैक्स की वसूली के साथ। अब इसे अमेरिका की जीत कहा जाएगा या ईरान की?
अमेरिका जिस मकसद के साथ इस युद्ध में आगे बढ़ा था, वह उसे हासिल नहीं कर सका। वह ये सोचकर चला था कि वेनेजुएला की तरह एक रात में ईरान की सत्ता और तेल दोनों हासिल कर लेगा, लेकिन नतीजा इसके बिल्कुल विपरीत निकला। अमेरिका के साथ डटकर लड़ने वाला ईरान पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरा है। होर्मुज पर ईरान ने जो दावे युद्ध के शुरुआत में किए थे, आज भी उसपर कायम है।
ईरान अपने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के बड़े जनरलों के मारे जाने के बावजूद ईरान 39 दिनों तक अमेरिका-इजरायल के सामने मजबूती से टिका रहा। ईरान का तेल भी उसके पास है, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भी उसके पास है और अपनी शर्तों पर वो अमेरिका के साथ बात कर रहा है। उसके ऊपर लगे प्रतिबंध हट चुके हैं, होर्मुज पर ट्रांजिट फीस लगाकर वो करोड़ों-अरबों रुपये की कमाई कर रहा है और आगे भी करेगा। ये सब देखते हुए कहा जाएगा कि जीत ईरान की हुई।
इस युद्ध ने अमेरिका के सुपरपावर की साख को बट्टा लगा दिया। ईरान के सामने सुपरपावर को घुटने टेकने पड़े। 39 दिन की जंग में अमेरिका ने पानी की तरह पैसा बहाया। इस जंग में अमेरिका ने करीब 80 अरब डॉलर खर्च कर दिए। अमेरिकी मिसाइलों का भंडार काफी हद तक खाली हो गया। दर्जनों अमेरिकी सैनिक मारे गए। दर्जनों फाइटर प्लेन स्वाहा हो गए। युद्ध की वजह से भारी कर्ज में डूबी अमेरिकी अर्थव्यवस्था और चरमरा गई। ट्रंप के फैसलों से नाराज होकर अमेरिका में लोग राष्ट्रपति के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। ये सब देखते हुए क्या कहा जाएगा? जीत अमेरिका की हुई या ईरान की?





