मां ही मनुष्य की प्रथम गुरु है, उपनिषदों में कहा गया है “मातृदेवो भव”, अर्थात मां को देवता के समान मानो, “आदि शक्ति”, “जगदंबा” और “दुर्गा” के रूप में आराध्य है

हर वर्ष मई महीने के दूसरे रविवार को मातृदिवस (Mother’s Day) मनाया जाता है। यह दिन मां के निःस्वार्थ प्रेम, त्याग, समर्पण और जीवन में उनके अमूल्य योगदान के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर होता है। मां और शिशु के बीच का यह अदृश्य, आत्मिक बंधन शब्दों से परे, अनुभूति का वह मधुर संगीत है, जो जीवनभर गूंजता रहता है। माँ केवल एक संबोधन ही नहीं है बल्कि सृष्टि की उस आदि, अनंत और दिव्य ऊर्जा का प्रतीक है, जिसने जीवन को जन्म दिया, उसे अपनी ममता की ऊष्मा में पाला-पोसा और हर कदम पर उसे दिशा प्रदान की है।

मां का प्रेम इस संसार का सबसे निर्मल, निष्कलुष और निस्वार्थ भाव है। यह वह सागर है, जिसकी गहराई को मापने के लिए कोई मापदंड नहीं, और जिसकी लहरों में केवल समर्पण की तरंगें उठती हैं। एक मां अपने बच्चे के लिए वह सब सहर्ष त्याग देती है, जिसकी कल्पना भी सामान्य मनुष्य के लिए कठिन है। वह अपने सुखों को पीछे छोड़ देती है, अपनी इच्छाओं को दफन कर देती है और अपने जीवन का केंद्र अपने बच्चे को बना लेती है।शिशु के जन्म से पहले ही मां और बच्चे के बीच एक अदृश्य संबंध स्थापित हो जाता है। यह संबंध केवल रक्त और शरीर का नहीं, बल्कि आत्मा और चेतना का होता है। यही कारण है कि बच्चा अपनी हर पीड़ा, हर भय और हर खुशी को सबसे पहले अपनी मां के साथ साझा करता है। मां का आंचल केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं होता। वह सुरक्षा का वह आश्रय है, जिसमें जीवन की हर आंधी थम जाती है।

मां ही मनुष्य की प्रथम गुरु है। बच्चा जब बोलना नहीं जानता, तब भी मां उसे समझती है। जब वह चलना सीखता है, तो मां उसका हाथ पकड़कर उसे गिरने से बचाती है। जीवन के प्रारंभिक वर्षों में मां ही वह शिल्पकार होती है, जो बच्चे के व्यक्तित्व को आकार देती है। वह केवल शब्द नहीं सिखाती, बल्कि जीवन के मूल्य सिखाती है सत्य क्या है, करुणा क्या है, धैर्य क्या है, और संघर्ष में कैसे स्थिर रहना है। मां की गोद वह पहली पाठशाला है, जहां बिना किसी पाठ्यक्रम के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पाठ सिखाए जाते हैं।

भारतीय संस्कृति में मां को देवत्व का दर्जा दिया गया है। उपनिषदों में कहा गया है “मातृदेवो भव”, अर्थात मां को देवता के समान मानो। यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन है, जो यह बताता है कि मां का स्थान ईश्वर के समकक्ष है। हमारी पौराणिक और ऐतिहासिक परंपराएं मातृत्व के गौरव से परिपूर्ण हैं। माता जीजाबाई ने अपने पुत्र शिवाजी के भीतर स्वराज और स्वाभिमान की ज्योति प्रज्वलित की। माता कुंती ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने पुत्रों को धर्म और सत्य के मार्ग पर चलाया। भारतीय चेतना में मातृत्व केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यहां धरती को “भारत माता”, नदियों को “गंगा मां” और प्रकृति को “धात्री” कहा जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारी संस्कृति में मातृत्व का अर्थ केवल जन्म देना नहीं, बल्कि पोषण और संरक्षण करना है।

मां के भीतर करुणा की अनंत धारा प्रवाहित होती है, सहनशीलता उसकी शक्ति बनती है और त्याग उसका स्वभाव। वह बिना किसी अपेक्षा के अपने संपूर्ण अस्तित्व को संतान के सुख, सुरक्षा और भविष्य के लिए समर्पित कर देती है। यही गुण उसे सामान्य से असामान्य, और मानवीय से दिव्य बना देते हैं। मां का प्रेम सीमाओं में नहीं बंधता वह क्षमा में भी है, संघर्ष में भी, और मौन आशीर्वाद में भी।यदि ईश्वर को किसी साकार रूप में अनुभव करना हो, तो वह मां की ममतामयी आंखों में झलकता है, उसके स्नेहिल स्पर्श में महसूस होता है और उसके आशीर्वाद में साकार हो उठता है। मां केवल पूजा की नहीं, अनुभूति की विषय है। वह जीवन की वह पवित्रतम उपस्थिति है, जिसमें सृष्टि का सार, प्रेम का विस्तार और ईश्वर का साक्षात्‌ निवास समाहित है।

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