
‘अंतर्राष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस’ (International Missing Children’s Day) जो हर वर्ष 25 मई को मनाया जाता है, की शुरुआत 1983 में अमेरिका में 25 मई को ‘नेशनल मिसिंग चिल्ड्रन्स डे’ के रूप में मनाने से हुई । अब यह दिवस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है।
आज दुनियाभर में हर साल हजारों बच्चे लापता हो जाते हैं। इनमें से कई बच्चे मानव तस्करी, बाल मजदूरी, अपहरण, घरेलू हिंसा और अपराधों का शिकार बनते हैं। कुछ बच्चे पारिवारिक विवादों, मानसिक तनाव, ऑनलाइन धोखाधड़ी या गलत संगति के कारण भी घर छोड़ देते हैं। छोटे बच्चों के मेलों, बाजारों, रेलवे स्टेशन और भीड़भाड़ वाले इलाकों में परिवार से बिछड़ने की घटनाएं भी आम हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी बच्चे के गुम होने के शुरुआती कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। यदि समय रहते सूचना देकर कार्रवाई की जाए तो बच्चे को सुरक्षित खोजे जाने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि सरकारें और सामाजिक संगठन बच्चों की तलाश के लिए तेज और प्रभावी तंत्र विकसित करने पर जोर दे रहे हैं।
गुमशुदा बच्चों को खोजने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा कई पहलें की जा रही हैं। भारत सरकार ने ‘ट्रैक चाइल्ड पोर्टल’ और ‘खोया-पाया पोर्टल’ जैसी ऑनलाइन सुविधाएं शुरू की हैं, जिनके माध्यम से गुमशुदा बच्चों की जानकारी साझा की जा सकती है। इसके अलावा बच्चों की सहायता के लिए 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन भी संचालित की जा रही है। रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और सार्वजनिक स्थलों पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर निगरानी बढ़ाई गई है।
स्कूल और शैक्षणिक संस्थान बच्चों को जागरूक बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। स्कूलों में बच्चों को ‘गुड टच-बैड टच’, ऑनलाइन सुरक्षा और आपातकालीन परिस्थितियों में व्यवहार संबंधी जानकारी दी जानी चाहिए।
बच्चों की सुरक्षा केवल सरकार या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार और समाज की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। अभिभावकों को बच्चों को सुरक्षा संबंधी जरूरी बातें सिखानी चाहिए। बच्चों को यह जानकारी होनी चाहिए कि अजनबियों से दूरी कैसे बनाए रखें, खतरे की स्थिति में मदद कैसे मांगें और अपने माता-पिता का मोबाइल नंबर कैसे याद रखें।









