
प्रतिवर्ष 20 जून को मनाया जाने वाला विश्व शरणार्थी दिवस उन करोड़ों लोगों के अदम्य साहस, अथक संघर्ष और सम्मानपूर्ण जीवन के अधिकार के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जिन्हें परिस्थितियों ने अपनी मातृभूमि से दूर अजनबी धरती पर जीवन आरंभ करने के लिए विवश कर दिया। यह दिवस केवल सहानुभूति या संवेदना प्रकट करने का अवसर नहीं है, बल्कि मानवता के अंतःकरण को झकझोरने वाला वह क्षण भी है, जब विश्व समुदाय स्वयं से यह प्रश्न पूछता है कि विज्ञान, तकनीक, आर्थिक समृद्धि और आधुनिक सभ्यता के अभूतपूर्व युग में भी करोड़ों मनुष्य सुरक्षा, सम्मान और स्थायी आश्रय की तलाश में दर-दर भटकने को क्यों विवश हैं।
जब युद्ध की विभीषिका, आतंक की अंधी गोलियां, राजनीतिक दमन, धार्मिक कट्टरता, जातीय हिंसा अथवा प्रकृति का प्रकोप किसी व्यक्ति को अपनी जन्मभूमि छोड़ने के लिए विवश कर देता है, तब वह केवल एक मकान नहीं खोता, बल्कि अपनी पहचान, अपनी जड़ों और अपने अस्तित्व का एक अमूल्य अंश भी पीछे छोड़ आता है। ऐसे ही बेघर, बेसहारा और विस्थापित लोगों को दुनिया “शरणार्थी” के नाम से जानती है।
आज जब विश्व युद्धों की विनाशकारी लपटों, भू-राजनीतिक संघर्षों, जलवायु परिवर्तन के बढ़ते संकट, आर्थिक अस्थिरता और मानवीय त्रासदियों के दौर से गुजर रहा है, तब शरणार्थी समस्या किसी एक देश, क्षेत्र या समुदाय की चुनौती नहीं रह गई है। यह संपूर्ण मानवता की करुणा, संवेदनशीलता और नैतिक उत्तरदायित्व की कठिन परीक्षा बन चुकी है। शरणार्थियों की आंखों में बसने वाली पीड़ा केवल उनके व्यक्तिगत दुःख की कहानी नहीं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था का मौन प्रश्न है, जो अभी भी प्रत्येक मनुष्य को भयमुक्त और सम्मानजनक जीवन का अधिकार सुनिश्चित करने में पूर्णतः सफल नहीं हो सकी है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप और विश्व के अनेक हिस्सों में करोड़ों लोग विस्थापित हो गए थे। इस मानवीय संकट ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को शरणार्थियों के अधिकारों की रक्षा हेतु एक संगठित व्यवस्था विकसित करने के लिए प्रेरित किया। इसी क्रम में वर्ष 1951 में “शरणार्थियों की स्थिति संबंधी सम्मेलन” (Refugee Convention) को अपनाया गया, जिसने अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी कानून की आधारशिला रखी। बाद में 1967 के प्रोटोकॉल ने इसकी भौगोलिक और समय संबंधी सीमाओं को समाप्त कर इसे वैश्विक स्वरूप प्रदान किया। दिसंबर 2000 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 20 जून को “विश्व शरणार्थी दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय लिया। वर्ष 2001 में पहली बार यह दिवस वैश्विक स्तर पर मनाया गया।
शरणार्थी संकट का स्थायी समाधान केवल राहत शिविरों या अस्थायी सहायता से संभव नहीं है। इसके लिए बहुआयामी और दीर्घकालिक प्रयास आवश्यक हैं। युद्ध और हिंसा को रोकना विस्थापन कम करने का सबसे प्रभावी उपाय है। सभी देशों को जिम्मेदारी साझा करते हुए मानवीय सहायता और पुनर्वास में योगदान देना होगा। शरणार्थियों को केवल आश्रय ही नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के अवसर भी उपलब्ध कराने होंगे।










