विश्‍व स्वच्छता दिवस : 20 सितंबर, इस वर्ष की थीम है “स्वच्छ थाली से स्वच्छ शहर तक”

“स्वच्छ थाली से स्वच्छ शहर तक” थीम के साथ आज “विश्व स्वच्छता दिवस” मनाया जा रहा है। स्वच्छता हमारे जीवन की बुनियादी जरूरत है। साफ घर, स्वच्छ सड़कें, कचरा-मुक्त बाजार, साफ नालियां और बेहतर सार्वजनिक स्थान सीधे हमारे स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता से जुड़े हैं। लेकिन आज स्वच्छता का अर्थ केवल झाड़ू लगाने या कूड़ा उठाने तक सीमित नहीं है। असली चुनौती हर दिन पैदा होने वाले कचरे को कम करना, उसका सही तरीके से पृथक्करण और निपटान करना तथा उपयोगी सामग्री को दोबारा संसाधन के रूप में इस्तेमाल करना है।

आज मनाये जा रहे दिवस का स्पष्ट संदेश है कि शहरों की स्वच्छता केवल सड़कों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई से संभव नहीं होगी, बल्कि इसकी शुरुआत घर और रसोई से भी करनी होगी। दुनिया में एक ओर करोड़ों लोग पर्याप्त भोजन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बड़ी मात्रा में भोजन बर्बाद होता है। भोजन की बर्बादी के साथ पानी, जमीन, ऊर्जा, श्रम और परिवहन जैसे संसाधन भी नष्ट होते हैं। इसलिए कचरे को कम करना पर्यावरण संरक्षण के साथ आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की जिम्मेदारी भी है।

आधुनिक जीवन ने सुविधाएं बढ़ाई हैं, लेकिन इसके साथ उपभोग और कचरे की मात्रा भी तेजी से बढ़ी है। बढ़ती आबादी, तेज शहरीकरण, बदलती जीवन शैली, पैकेजिंग का बढ़ता इस्तेमाल और वस्तुओं को जल्दी बदलने की आदत ने कचरे की समस्या को गंभीर बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के Global Waste Management Outlook 2024 के अनुसार, दुनिया में नगरपालिका ठोस कचरे की मात्रा 2023 में करीब 2.1 अरब टन थी। मौजूदा रुझान जारी रहने पर 2050 तक इसके बढ़कर लगभग 3.8 अरब टन होने का अनुमान है।

समस्या सिर्फ यह नहीं है कि कचरा अधिक पैदा हो रहा है। बड़ी चुनौती यह है कि उसके संग्रह, पृथक्करण, परिवहन, प्रसंस्करण और वैज्ञानिक निपटान की व्यवस्था उसी गति से मजबूत नहीं हो पा रही है। खुले में फेंका गया या जलाया गया कचरा हवा, मिट्टी और जल को प्रभावित करता है तथा लंबे समय तक पर्यावरणीय नुकसान पहुंचाता है।

कचरा प्रबंधन की शुरुआत घर, दुकान, कार्यालय, स्कूल और अन्य संस्थानों से होनी चाहिए। कचरा पैदा होने के समय ही उसे अलग-अलग कर दिया जाए, तो उसके संग्रह, प्रसंस्करण और निपटान की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो जाती है। भारत में 2016 के ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों में स्रोत पर कचरा पृथक्करण और अलग-अलग संग्रह पर विशेष जोर दिया गया था।

किसी भी शहर को केवल सरकारी व्यवस्था के भरोसे पूरी तरह स्वच्छ नहीं रखा जा सकता। इसमें नागरिकों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है। कचरा सड़क पर न डालना, गीले और सूखे कचरे को अलग रखना, प्लास्टिक का अनावश्यक इस्तेमाल कम करना, कपड़े के थैले का उपयोग करना, पुराने सामान को फेंकने के बजाय दोबारा इस्तेमाल करना और भोजन को बर्बाद न करना ये साधारण कदम हैं, लेकिन इनका सामूहिक प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है। स्वच्छता की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लोग सफाई को किसी दूसरे की जिम्मेदारी न मानें। जिस व्यक्ति ने कचरा पैदा किया है, उसकी भी जिम्मेदारी है कि वह उसे सही तरीके से आगे की व्यवस्था तक पहुंचाए।

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