
विश्व नेत्रदान दिवस मानवता, संवेदनशीलता और परोपकार के उस महान संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का अवसर प्रदान करता है, जो किसी व्यक्ति के जीवन के बाद भी दूसरों के जीवन में उजाला भर सकता है। इस दिवस का उद्देश्य लोगों को नेत्रदान के महत्व, इसकी आवश्यकता और सामाजिक उपयोगिता के प्रति जागरूक करना है।
आँखे मनुष्य के लिए केवल देखने का माध्यम नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुभव, आत्मनिर्भरता और जीवन की संभावनाओं का द्वार है। आंखों के माध्यम से ही व्यक्ति संसार की सुंदरता, अपने प्रियजनों का स्नेह, प्रकृति का वैभव और जीवन के रंगों का अनुभव कर पाता है। पर जब किसी कारणवश दृष्टि चली जाती है, तब व्यक्ति का जीवन अनेक कठिनाइयों से घिर जाता है। ऐसे में किसी दिवंगत व्यक्ति के दान किए गए कॉर्निया किसी दृष्टिबाधित व्यक्ति के जीवन में पुनः प्रकाश ला सकते हैं।
इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को नेत्रदान के लिए प्रेरित करना तथा समाज में व्याप्त भ्रांतियों और आशंकाओं को दूर करना है। आज भी विश्वभर में करोड़ों लोग दृष्टिबाधिता या अंधत्व से प्रभावित हैं। इनमें से बड़ी संख्या उन लोगों की है जो कॉर्निया संबंधी रोगों के कारण दृष्टिहीन हैं और जिनकी दृष्टि कॉर्निया प्रत्यारोपण द्वारा वापस लाई जा सकती है। दुर्भाग्यवश, उपलब्ध कॉर्निया की संख्या आवश्यकता की तुलना में काफी कम है। इस अंतर को कम करने के लिए व्यापक जनभागीदारी और सामाजिक सहयोग आवश्यक है।
भारतीय संस्कृति में दान को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है। वेद, उपनिषद, पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथ लोक कल्याण के लिए दान को श्रेष्ठतम कर्म बताते हैं। हमारी परंपरा में अन्नदान, विद्यादान, गोदान, रक्तदान और देहदान जैसी अनेक परोपकारी परंपराएं रही हैं। नेत्रदान को आधुनिक युग का महादान कहा जा सकता है, क्योंकि यह किसी व्यक्ति को पुनः संसार देखने का अवसर प्रदान करता है।
एक नेत्रदाता दो व्यक्तियों को दृष्टि प्रदान कर सकता है। इस प्रकार एक परिवार का निर्णय दो परिवारों के जीवन में खुशियां ला सकता है।










