
18 जून, 1946 की तारीख गोवा के इतिहास में गहरे अक्षरों में दर्ज है। यह वो तारीख है जब डॉ. राम मनोहर लोहिया ने गोवा में क्रांति की नींव रखी। गोवा के लोगों को पुर्तगालियों से आाजादी पाने का रास्ता दिखाया। पुलिस ने उन पर पिस्तौल तान दी, फिर भी वे रुके नहीं।
पुर्तगालियों ने लगभग 450 साल गोवा पर राज किया। इसी गोवा में आजादी का बिगुल फूंका था समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने जो गोवा क्रांति दिवस के रूप में याद किया गया। डॉ. लोहिया ने गोवा के लोगों को 18 जून 1946 को संबोधित किया। उन्हें आजादी के प्रति उकसाया। पुलिस ने उन पर पिस्तौल तान दी, फिर भी वे रुके नहीं।
भारत आजाद हो चुका था, लेकिन फिर भी गोवा अभी भी पुर्तगाल के अधीन था। लोगों पर सख्ती से शासन किया जाता था। सार्वजनिक सभाओं पर पाबंदी थी। गोवा में आजादी की बात करना भी मुश्किल था। पुर्तगाली शासक इसे अन्यथा लेते और आम भारतीयों पर सख्ती करते थे।
जून 1946 में लोहिया बीमार थे। मेनेसेस ने उन्हें आराम के लिए गोवा बुलाया। 10 जून को दोनों असोलना पहुंचे। खबर फैली तो कई स्वतंत्रता सेनानी उनसे मिलने आए। उन्होंने मिलकर योजना बनाई। लोहिया और मेनेसेस ने फैसला किया कि वे पुर्तगाली पाबंदी तोड़ेंगे। वे खुलकर लोगो से बात करेंगे। 15 से 17 जून को उन्होंने पणजी और मुरगांव में सभाएं कीं।
18 जून को मुरगांव में बड़ी सभा का ऐलान किया गया। पुर्तगाल की पुलिस ने पहले से तैयारी कर ली। सभी टैक्सियों को पुलिस स्टेशन बुला लिया गया। मैदान को घेर लिया गया, फिर भी कुछ लोग इंतजार करते रहे। लोहिया और मेनेसेस घोड़े वाली गाड़ी से पहुंचे। लोग नारे लगा रहे थे। तीन लोगों ने उन्हें माला पहनाई।
यह सब देखकर पुलिस अधिकारी कैप्टन फॉर्चुनाटो मिरांडा आग-बबूला हुआ और उसने लोहिया के सामने पिस्तौल तान दी। धमकी दी कि आगे मत बढ़ो। लोहिया ने शांति से उन्हें हटाया। वे आगे बढ़े और बोलने लगे। मिरांडा ने फिर पिस्तौल दिखाई। लोहिया ने कहा-यह बंदूक मुझे नहीं डरा सकती। सभा शुरू हुई। लोहिया ने लोगों से कहा-गोवा हिंदुस्तान का हिस्सा है। पुर्तगाल का शासन एक बुरा सपना है, यह खत्म होगा। भीड़ बढ़कर 600-700 लोगों तक पहुंच गई। इतिहास में कुछ जगहों पर 200 लोगों की शुरुआती सभा का जिक्र भी मिलता है।
डॉ. लोहिया के साथ हुई यह घटना पूरे भारत में फैली। महात्मा गांधी ने पुर्तगाली गवर्नर को पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि आजाद भारत में गोवा अलग नहीं रह सकता। इस घटना के बाद लोगों में गजब का उत्साह देखा गया। डेढ़ हजार से से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं। लोगों में जुनून बढ़ता गया, जो एक सुखद संकेत की तरह था। गोवा के कई युवा इस घटना से प्रेरित हुए। सत्याग्रह और विरोध प्रदर्शन बढ़े। इस तरह यह दिन गोवा मुक्ति आंदोलन का दीपक बना।











