आज 11 सितम्‍बर को नीम करोली बाबा की पुण्‍यतिथ‍ि, उन्होंने आज के दिन वृंदावन में अंतिम सांस ली थी

आज 11 सितम्‍बर को नीम करोली बाबा की पुण्‍यतिथ‍ि है। उन्होंने आज ही के दिन वृंदावन में अंतिम सांस ली थी। आज उनके फॉलोवर्स की संख्या करोड़ों में है। कैंची धाम में साल-दर-साल भीड़ बढ़ती ही जा रही है। बाबा की कहानी रोचक भी है और प्रेरक भी। बाबा हनुमान भक्त थे और चमत्कारी थे। नीम करोली बाबा का नाम भारत के प्रसिद्ध संतों में लिया जाता है। उत्तराखंड का कैंची धाम आज उनके भक्तों के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है। देश ही नहीं, विदेशों में भी लोग उन्हें श्रद्धा से याद करते हैं. उनका जीवन भक्ति, सेवा, सादगी और रहस्य से जुड़ा रहा है।

नीम करोली बाबा का असली नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में करीब वर्ष 1900 के आसपास माना जाता है। उनका परिवार संपन्न और प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार था। वे कौशल्या देवी और दुर्गा प्रसाद शर्मा के पुत्र थे। लक्ष्मी नारायण शर्मा का मन बचपन से ही धार्मिक कार्यों में लगता था। हनुमान जी के प्रति उनकी गहरी आस्था थी। किशोरावस्था में ही उन्हें संसार की मोह माया से दूरी महसूस होने लगी थी। करीब 11 वर्ष की उम्र में उनका विवाह राम बेटी देवी से कर दिया गया। विवाह के बाद भी उनका मन पूरी तरह गृहस्थ जीवन में नहीं लगा। वह साधु जीवन और आध्यात्मिक साधना की ओर आकर्षित होते चले गए।

कहा जाता है कि करीब 17 वर्ष की आयु में उन्हें आध्यात्मिक अनुभव हुआ। इसके बाद उनका झुकाव साधना की ओर और बढ़ गया। वह घर छोड़कर अलग-अलग स्थानों पर घूमने लगे। इस दौरान उन्होंने कई जगहों पर तपस्या की। गुजरात के बवानिया मोरबी क्षेत्र में भी उन्होंने साधना की। वहां लोग उन्हें तलइया बाबा के नाम से जानने लगे। आगे चलकर उन्हें लक्ष्मण दास, हांडी वाले बाबा और तिकोनिया वाले बाबा जैसे नामों से भी पुकारा गया।

कई वर्षों तक घर से दूर रहने के बाद पिता को पता चला कि फर्रुखाबाद जिले के नीब करौरी गांव में उनके जैसे दिखने वाला एक साधु रह रहा है। उनके पिता वहां पहुंचे और उन्होंने लक्ष्मी नारायण शर्मा को पहचान लिया। पिता के आग्रह पर उन्हें घर वापस लौटना पड़ा। इसके बाद उन्होंने कुछ समय गृहस्थ जीवन बिताया। उनके दो पुत्र और एक पुत्री हुए लेकिन उनका मन हमेशा आध्यात्मिक कार्यों में लगा रहा। परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ वह लोगों की सहायता भी करते थे। स्थानीय लोगों के बीच उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती गई। कई कथाओं में उन्हें लंबे समय तक गांव का निर्विरोध प्रधान भी बताया गया है।

बताया जाता है कि वर्ष 1958 के आसपास उन्होंने फिर से गृहस्थ जीवन से दूरी बना ली। वह किसी विशेष पंथ या दिखावे के पक्ष में नहीं थे। उनका जोर प्रेम, सेवा और भगवान के स्मरण पर था। वह साधारण कपड़े पहनते थे। अक्सर मोटा कंबल ओढ़े रहते थे। यही कंबल आगे चलकर उनकी पहचान बन गया। उनके भक्त आज भी कंबल को बाबा की स्मृति से जोड़ते हैं।
कैंची धाम में हर वर्ष 15 जून को स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त हनुमान जी की पूजा करते हैं। प्रसाद बांटा जाता है। पूरे परिसर में भक्ति और सेवा का वातावरण दिखाई देता है।

नीम करोली बाबा का संदेश बहुत सरल था। वह प्रेम को सबसे बड़ी शक्ति मानते थे। वह लोगों से कहते थे कि भगवान का नाम लो और दूसरों की सेवा करो। सभी लोगों से प्रेम करो, जरूरतमंद की सहायता करो, भोजन का सम्मान करो, अहंकार से दूर रहो, हनुमान जी की भक्ति करो, कठिन समय में धैर्य रखो, सेवा को जीवन का हिस्सा बनाओ।

SHARE